Friday, February 15, 2019

प्रकृति सिखा रही है पल पल


१६ फरवरी २०१९ 
प्रकृति की अपनी एक भाषा है, उसे सुनने की कला यदि कोई सीख ले तो सारी कायनात उसके साथ संवाद करती हुई प्रतीत होती है. प्रकृति के पास अनंत धैर्य है, एक पत्थर हजार वर्ष तक पड़ा रह सकता है और एक दिन रेत का एक महीन कण बन जाता है, फिर किसी खेत में उसका रूप बदल कर वनस्पति बन जाता है, वह वनस्पति किसी पशु के पेट में जाकर उसका रक्त  भी बन सकती है और वही एक दिन मानव योनि में भी जन्म सकता है. पत्थर से मानव बनने में कितना समय लगेगा यह कोई नहीं जानता. किन्तु हम देख सकते हैं जो आज पत्थर है वह भविष्य का मानव है, यानि जो आज मानव है वह कभी पत्थर था. दोनों आज भी मौजूद हैं. जो दोनों को एक साथ देख सकती है वह चेतना है, जो न कभी जन्मती है न बदलती है, जो सदा एक सी है.   

2 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 75वीं पुण्यतिथि - दादा साहेब फाल्के और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    ReplyDelete