Showing posts with label भूत. Show all posts
Showing posts with label भूत. Show all posts

Friday, August 21, 2015

जगा रहे मन घड़ी-घड़ी


जीवन को गहराई से महसूस करना हो तो वर्तमान के क्षण में ही किया जा सकता है, पर हम न  जाने कितना समय अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं में खो देते हैं. रात्रि को स्वप्न देखना स्वाभाविक है पर जागते हुए भी भीतर जो विचार की धारा चलती रहती है वह स्वप्न ही है, संत जन तभी कहते हैं हम जागते हुए भी सोये हैं. जिस क्षण हम भोजन कर रहे हैं, मन कहीं और है, स्वप्न चल रहा है, ऊर्जा व्यर्थ ही बही जा रही है, जिस समय किसी से वार्तालाप कर रहे हैं, भीतर एक अन्य बातचीत चल रही है, अर्थात हम जहाँ होते हैं अक्सर वहाँ नहीं होते, इसी कारण मन थक जाता है. संतजन प्रफ्फुलित रह पाते हैं क्योंकि उन्होंने इस राज को जान लिया है, वह निरंतर ऊर्जा के प्रवाह को बनाये रखते हैं. 

Wednesday, February 12, 2014

कालातीत से प्रीत लगायें

अगस्त २००५ 
भूत का शोक, भविष्य से भय तथा वर्तमान में मोह जब तक बना हुआ है तब तक हम काल के वश में हैं. जब कालातीत भगवान से प्रीति हो जाती है तब ही पहली बार आनन्द का अनुभव होता है. जब हमें धर्म-अधर्म, श्रेय-प्रेय, उचित-अनुचित का बोध होता रहता है, वर्तमान में टिकना सहज होता है. जो जिस क्षण में घटता है वह उस क्षण की मांग होती है, यह स्वीकार करने से न भूत का शोक होता है न भविष्य से भय लगता है. यदि मन में विरोध का फल बोया तो भविष्य में उसका फल खाना पड़ेगा. अतः हमें अपने हृदय की समता बनाये रखनी है और काल के बंधन से मुक्त होना है.

Tuesday, December 17, 2013

सजगता ही साधनी है

मई २००५ 
मन का जो जानने वाला हिस्सा है, वह सजग रहे तो ही हम वर्तमान में रह सकते हैं, वरना मन की सहज आदत है कभी भूत में जाना कभी भविष्य की कल्पना करना. कोई अन्य यदि हमें अपना दुःख कहे तो हम उसके प्रति सहज ही संवेदना प्रकट करते हैं वैसे ही मन में जब कोई दुःखद बात याद आती है तो यंत्र की तरह मन उसके प्रति दुखद संवेदना जगाता है, और दुःख का संस्कार भीतर पक्का हो जाता है. सजग रहकर हम बस साक्षी होते हैं की अब मन ने दुखद को याद किया अब सुखद को याद किया, दोनों ही स्वप्न मात्र हैं, हमारे सुख-दुःख का कारण वह घटना नहीं बल्कि हमारे मन की प्रतिक्रिया है, क्रोध के समय जो अपशब्द हम बोलते हैं, वे सामने वाले को दुखी करें या नहीं यह उसकी सजगता पर निर्भर है पर हमने अपने भीतर  दुःख का बीज बो दिया यह तो तय है, और बाद में इसे याद करके मन इसे भी संस्कार के रूप में सुरक्षित रख लेता है. कोई दूसरा हमें व्याकुल करे तो हम स्वयं को बचा भी सकते हैं पर संस्कार रूप में संजो कर रखे अपने ही मन से कोई कैसे बच सकता है, साक्षी भाव ही एक मात्र उपाय है, और तब भीतर एक आह्लाद का जन्म होता है, जैसा बच्चे की हरकतों को देखकर होता है.

Tuesday, November 5, 2013

मन को बस मन ही जाने

मार्च २००५ 
मन कितने-कितने विचारों में खो जाता है, काम करते हुए अथवा ध्यान करते हुए भी हमारा मन पुनः पुनः चहुँ ओर विचरने लगता है. कभी वर्तमान में रहना ही नहीं चाहता, वर्तमान में ही हमारे सारे प्रश्नों का हल है, सारी तलाश वर्तमान में ही समाप्त होने वाली है, हम जिसे चाहते हैं वह भी वर्तमान में मिले तभी तुष्टि होगी, भूत तो सताते हैं और भविष्य भरमाता है. वर्तमान ही सत्य है, हमें यह बात जितनी जल्दी समझ आ जाये उतना ही अच्छा है. मन जानता है कि वर्तमान में वह रहता ही नहीं, उसका कोई महत्व नहीं रह जाता, अपने अहंकार को बढ़ाने के लिए कोई कथा-कहानी जो नहीं रह जाती उसके पास. मन ही वह पर्दा है जो हमारे और परमात्मा के बीच में है, इसके गिरते ही सत्य स्वयं स्पष्ट हो जाता है. मन पुष्ट होता है इन्द्रियों के कारण, यदि इन्द्रियां सत्कार्यों में लगी रहें तो मन भी सद्विचारों से युक्त होगा, सात्विक मन ध्यान में बाधा नहीं डालेगा, पर भीतर गहरे जाने पर उन्हें भी विदा होना होगा. सद्गुरु की कृपा से यह सम्भव है.

Monday, July 1, 2013

करते हो तुम कन्हैया ...

अक्तूबर २००४ 
एक साधक को अपने मन में उठने वाली वृत्तियों का भी परिष्कार करना है, क्योंकि मन में वृत्तियाँ तो निरंतर समुद्र की लहरों की तरह उठती रहती हैं, वे अशुभ न हों, शुभ हों, धीरे-धीरे उन शुभ वृत्तियों को भी कम करते जाना होगा, तब मन शुद्ध तत्व में स्थित रहेगा, वर्तमान में रहेगा. भूत की स्मृतियाँ और भावी की कल्पनाएँ हमें ‘अपने’ होने से दूर रखती हैं, स्वयं में कोई वृत्ति नहीं है, यदि है भी तो वह हमारे द्वारा लायी नहीं गयी है, यदि आ भी गयी है तो हम साक्षी मात्र हैं. अनायास ही हम उसके कर्ता नहीं हो गये हैं, कर्ता बनने पर भोक्ता तो बनना ही पड़ेगा. हम अपने आत्मभाव में स्थित रहकर ही प्रज्ञा, बुद्धि व क्षमता का पूर्ण उपयोग कर सकते हैं, सामान्य बुद्धि से यदि हम जगत का निर्णय करेंगे तो दुविधा हमें घेर लेगी. जगत से व्यवहार करते समय यदि हम यह याद रखें कि वास्तव में ‘हम कौन हैं’? तो हम किसी भी परिस्थिति से अछूते निकल जायेंगे.


Wednesday, March 13, 2013

वर्तमान का नन्हा सा क्षण


मई २००४ 
जिस समय हम पूर्ण वर्तमान में पहुंच जाते हैं, अपने आप शांत हो जाते हैं. वर्तमान कभी पीड़ा नहीं देता, सदा भूत व भविष्य ही पीड़ा के कारण होते हैं. हमारे कार्य भी तभी बिगड़ते हैं जब हम वर्तमान से चूक जाते हैं. ध्यान में हमें वर्तमान की शक्ति अनुभूत होती है. साधक को अभी बहुत दूर जाना है पर सद्गुरु अथवा इष्ट का साथ मिलने से अध्यात्मिक यात्रा सरल हो जाती है. मन में कोई प्रश्न उठे तो भीतर से उसका उत्तर आता है. भीतर जो भी शुभ विचार अथवा आनंद उभरता है वह उन्हीं का प्रसाद  है. उस गुरुतत्व का अनुभव वर्तमान का शुद्धतम क्षण ही दिलाता है. कृष्ण जो जगद्गुरु हैं, हमारी आत्मा की आत्मा हैं, हमारी आत्मा कृष्ण का कलेवर है, तभी सदा शुभ का परामर्श देती है. जैसे लोहा चुम्बक के पास एक बार पहुंच जाता है तो शेष कार्य चुम्बक ही करता है, वैसे ही यदि एक बार हम कृष्ण को अपना सखा बना लें तो वह हमें छोड़ता नहीं. यह जगत जो स्थायी होने का भ्रम देता है, पल-पल बदल रहा है, यह मन यदि आत्मा का स्थायित्व नहीं पाता, अस्थिर ही रहेगा.



Tuesday, March 5, 2013

कुछ न करे जब पल भर को मन


मई २००४ 
ध्यान में हमें कुछ न करने का सुझाव दिया जाता है, जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत मानव सदा कुछ न कुछ करता ही रहता है. सदा बाहर की ओर ही उसकी इन्द्रियाँ दौड़ती हैं, सदा कुछ न कुछ पाने की चाह, कोई न कोई इच्छा उसे निरंतर दौड़ते रहने पर मजबूर करती है, पर जब यह मन समझ जाता है कि उसकी यह दौड़ कोल्हू के बैल की तरह है जो उसे कहीं नहीं पहुंचाती, तो वह ध्यान में उत्सुक होता है. अभ्यास से मन टिकने लगता है, भूत की चिंता व भविष्य की आशंका से मुक्त हो वर्तमान के उस छोटे से द्वार में प्रवेश करना सीख लेता है जो अनंत में खुलता है.

Saturday, October 27, 2012

शिव ही सुंदर है


सितम्बर २००३ 
मन आखिर है क्या, कुछ संकल्प-विकल्प, कुछ आशाएं, कुछ विरोध, कुछ इच्छाएं, सब मिला-जुला कर मन बन जाता है. थोड़ा गहराई से देखें तो मन कुछ है ही नहीं, इच्छाओं को हटाते जाएँ तो संकल्प-विकल्प भी नहीं बचते, किसी से कोई विरोध रहता ही नहीं, जब सभी कुछ इसी क्षण हमारे पास है तो भावी की कोई योजना भी नहीं रहती. भूत तो मृत है और समय कितनी तेजी से व्यतीत हो रहा है, हर नया क्षण आते ही पूर्व क्षण मृत हो जाता है, केवल वर्तमान का क्षण हमारे सम्मुख है तो मन कहाँ गया, मन अमनी भाव में चला जाता है, जो शेष बचा वह शांति है, परम शांति, परम आनंद, क्योंकि मन ही माया का वह पर्दा है जो हमारे असली स्वरूप और हममें दूरी बनाये हुए है. पर्दा हटते ही आत्मा का सूर्य अपने पूरे वैभव के साथ चमचमा उठता है, उसमें हजारों बिंब उभरते हैं, अनेकों स्वर्ण रश्मियाँ तथा बिंदु उभरते हैं, उन रंग-बिरंगे बिम्बों के मध्य कई आकृतियाँ बनती हैं. उस सौंदर्य का वर्णन नहीं किया जा सकता जैसे कोई फिल्म की रील चल रही हो, ऐसे अनेकों दृश्य आते हैं जाते हैं, जगत भी ऐस ही है यहाँ हर क्षण जल के बुदबुदों की तरह कितने प्राणी जन्मते हैं फिर नष्ट होते हैं. बनना, बिगडना और कुछ क्षणों के लिए स्थित रहना यही जीवन है. यह अस्थायी है पर स्थायी प्रतीत होता है, इस अस्थायीरूप को यदि हम सत्य मान लें तो हिस्से में दुःख भी आएंगे सुख के पीछे-पीछे. मन के पार ही परम सुख है.

Friday, July 27, 2012

शरण में उसकी आना होगा


 जून २००३ 
जिसका मन स्थिर नहीं है, वह क्षण-क्षण में रुष्ट-तुष्ट होता है, और ऐसे मन का विश्वास नहीं किया जा सकता. हम स्थिर मना बनें यही साधना का लक्ष्य है. भगवद् गीता का मूल उपदेश भी यही है. इसका उपाय भी कृष्ण ने बताया है, परमात्मा में मन लगाएं तो वह अपने आप ही जगत के उतार-चढ़ाव के द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है. एक बार कोई उसकी शरण में आ जाये वह हर पल उसे अपनी निगरानी में रखते हैं, उसके कुशल-क्षेम की जिम्मेदारी ले लेते हैं. फिर वह इधर-उधर जाना भी चाहे तो उसे रास नहीं आता. परमात्मा हमारे मन की गहराई में स्थित है, उसका स्मरण करते करते हम वहीं पहुंचते जाते हैं, जो ज्ञान, प्रेम और सामर्थ्य हमारे भीतर सुप्त है धीरे-धीरे प्रकट होने लगता है. हम वर्तमान में रहना सीख जाते हैं, क्योंकि तब भूत या भविष्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता, हम थे, हम हैं, हम रहेंगे यह भाव दृढ़ होता जाता है. तब यह छोटे-छोटे ताप आदि हमें हिला नहीं पाते. परम रहस्य स्वयं खुलने लगते हैं, भीतर-बाहर उसी एक परमात्मा की सत्ता का दर्शन होता है. उसका प्रेम अनुपम है, वह अवर्णनीय है, वह मात्र अनुभव से ही जाना जा सकता है. उसकी कृपा और सदगुरु का ज्ञान साधक की यही सबसे बड़ी पूंजी होती है.


Wednesday, October 5, 2011

जागृत मन


मई २००२ 
मन सोया है या जाग गया है इसका पता कैसे चले तो शास्त्र बताते हैं कि सजगतापूर्वक वर्तमान में रहना इसकी पहली निशानी है. भूत का पश्चाताप भीतर न चलता हो भविष्य की कल्पना में संकल्प न उठते हों जिस क्षण जो कार्य हम कर रहे हों पूर्ण रूप से मन वहीं टिका हो तो ऊर्जा बचती है. दूसरी पहचान है मन सहज ही आनन्दित हो कुछ करके या कुछ पाकर खुश होना सोये मन का काम है, समाहित मन तो भीतर अपने मूल से जुड़ा होने कारण सहज ही प्रसन्न होता है. अहंकार वर्तमान में नहीं होता अहंकार भूत या भविष्य के साथ ही जुड़ा है और दुख का कारण वही है. जो वस्तु, व्यक्ति, या परिस्थिति हमारे सामने आये सहज बुद्धि से उसके साथ व्यवहार करने के बाद यदि मन खाली रहता है तो मन जाग गया है. यदि प्रभाव में आ जाता है तो सोया है.   
  

Tuesday, August 9, 2011

सहज ध्यान

अगस्त २००१ 

यह जीवन जो हमें ईश्वर से उपहार स्वरूप मिला है, उसी का दिया है, वही इसे चलाता, पोषता और सम्भालता है. फिर भी हम कहते हैं उसके लिए हमारे पास समय नहीं है. सारा समय तो उसी का है. उसको पाना कितना सरल है., कितना सहज जैसे श्वास लेना लेकिन हम ढंग से श्वास भी तो लेना नहीं जानते. उथली श्वास लेते हैं जो उथले विचारों को दर्शाती है. श्वास के प्रति जागरूक रहकर हम वर्तमान में रह सकते हैं अन्यथा भूत या भविष्य की कल्पनाएँ हमारा पीछा नहीं छोडती. यह सहज ध्यान है.

Wednesday, June 15, 2011

वर्तमान का सुख


मई २०००

जीवन की इस यात्रा में हमें थोड़ा सा सम्भल-सम्भल के चलना है, मंजिल तभी मिलेगी. व्यर्थ ही भूत की स्मृतियों तथा भविष्य की कल्पनाओं में भ्रमित रहकर कहीं वर्तमान को कटु न बना लें. ईश्वर प्रेम के रस का अनुभव यदि एक बार भी हो जाये तो जगत में दोष नजर ही नहीं आता ऐसा संत कहते हैं. अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते रहें तो मन स्वयंमेव ही प्रफ्फुलित रहता है. बेचैनी का जन्म तब होता है जब हम अपने मार्ग से हटते हैं, जैसे बीमारी का आगमन तभी होता है जब हम स्वास्थ्य के नियमों का पालन नहीं करते.