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Wednesday, January 15, 2014

शरण में आये हैं हम तुम्हारी

जून २००५ 
निजी सुख की कामना का त्याग ही हमें ईश्वर के राज्य में ले जाता है. अपने स्वार्थ की सिद्धि चाहना ही दुःख का कारण है. दुःख हमें ईश्वर से दूर ले जाता है. दुखी होकर हम अपने को ही हानि ही पहुंचाते हैं, दुखी होना अज्ञानता का लक्षण है. ज्ञान का आश्रय लेते ही हम सुखी होने का गुर सीख लेते हैं. सभी दुखों से छूट जाना ही मुक्ति है, मोक्ष है, यही भगवद प्राप्ति है. इसे पाने के लिए हमारी योग्यता का कुछ भी महत्व नहीं है, अर्थात हम अपनी योग्यता के बल पर भगवद प्राप्ति नहीं कर सकते. हमें अहंकार का त्याग करके शरण में जाना होगा, अपने कुशल-क्षेम की जिम्मेदारी अस्तित्त्व पर छोड़ देनी होगी. कृष्ण ने स्वयं ही अपनी प्राप्ति का मार्ग बताया है-

सर्व धर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज  
अहम् त्वां सर्व पापेभ्य मोक्ष्यामि माशुचः


शरण में जाने का मार्ग सद्गुरु बताते हैं, जहाँ से वृत्ति उठती है, उसमें विश्रांति पाने का नाम ही शरणागति है. ध्यान, प्रार्थना अथवा जप में हम उस स्थान पर पहुंच जाते हैं जहाँ से सारे विचार उठते हैं, जो मन, बुद्धि का उद्गम है, जो समस्त कारणों का कारण है, वहीं जाकर आनन्द का अनुभव होता है.

Sunday, September 9, 2012

कृष्ण से कोई दूर नहीं है


अगस्त २००३ 
कृष्ण की वाणी अमोघ है, अमूल्य है, वह हमें ज्ञान का उपहार देते हैं, जिसे पाकर हम कृतकृत्य हो जाते हैं, कितने सरल शब्दों में कितनी उच्च बात वह कह जाते हैं, उनका प्रेम अनंत है, वह प्रेमस्वरूप हैं, तभी वह संसार के हर प्राणी से प्रेम करते हैं, हित चाहते हैं सभी का और जो भी उनकी शरण में जाता है, उसके कुशल क्षेम की रक्षा का भार वह स्वयं ले लेते हैं. वह जानते हैं हमारे लिये क्या उचित है क्या नहीं, वह हमारी भौतिक और आध्यात्मिक दोनों मांगों को स्वीकारते हैं, वह हमें पूरा का पूरा अपनाते हैं और स्वयं को भी पूरा का पूरा दे डालते हैं, वह कुछ शेष नहीं रखते, वह दूरी नहीं चाहते. वह प्रेम के बदले मात्र प्रेम ही चाहते हैं. वह सफलता असफलता को संसार के नजरिये से नहीं देखते. वह हमारे मन को पढ़ना जानते हैं और उसी के अनुरूप ज्ञान देते हैं. कृष्ण से हमारी निकटता भावना के स्तर पर है और आत्मिक स्तर पर भी, बल्कि वह स्वयं ही हमारी आत्मा है, तभी वह इतना अपना लगता है. उसकी आँखें देखना चाहें तो मीरा की आँखें देखनी होंगी, वह और हमारा अपना आप एक ही है, इस एकता की अनुभूति में अनोखा आनंद है, शांति है और प्रेम है. यहाँ कोई भेद नहीं, यह सहना है उस अथाह प्रेम को जो भक्त के भीतर उमड़ता है तो कचोट कर रख देता है. 

Friday, July 27, 2012

शरण में उसकी आना होगा


 जून २००३ 
जिसका मन स्थिर नहीं है, वह क्षण-क्षण में रुष्ट-तुष्ट होता है, और ऐसे मन का विश्वास नहीं किया जा सकता. हम स्थिर मना बनें यही साधना का लक्ष्य है. भगवद् गीता का मूल उपदेश भी यही है. इसका उपाय भी कृष्ण ने बताया है, परमात्मा में मन लगाएं तो वह अपने आप ही जगत के उतार-चढ़ाव के द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है. एक बार कोई उसकी शरण में आ जाये वह हर पल उसे अपनी निगरानी में रखते हैं, उसके कुशल-क्षेम की जिम्मेदारी ले लेते हैं. फिर वह इधर-उधर जाना भी चाहे तो उसे रास नहीं आता. परमात्मा हमारे मन की गहराई में स्थित है, उसका स्मरण करते करते हम वहीं पहुंचते जाते हैं, जो ज्ञान, प्रेम और सामर्थ्य हमारे भीतर सुप्त है धीरे-धीरे प्रकट होने लगता है. हम वर्तमान में रहना सीख जाते हैं, क्योंकि तब भूत या भविष्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता, हम थे, हम हैं, हम रहेंगे यह भाव दृढ़ होता जाता है. तब यह छोटे-छोटे ताप आदि हमें हिला नहीं पाते. परम रहस्य स्वयं खुलने लगते हैं, भीतर-बाहर उसी एक परमात्मा की सत्ता का दर्शन होता है. उसका प्रेम अनुपम है, वह अवर्णनीय है, वह मात्र अनुभव से ही जाना जा सकता है. उसकी कृपा और सदगुरु का ज्ञान साधक की यही सबसे बड़ी पूंजी होती है.


Monday, November 14, 2011

सत्यं, शिवं,सुन्दरं



जो अपने लिये सत्यं, शिवं और सुन्दरं के अलावा कुछ नहीं चाहता, प्रकृति भी उसके लिये अपने नियम बदलने को तैयार हो जाती है. जो अपने स्व का विस्तार करता जाता है, जैसे-जैसे अपने निहित स्वार्थ को त्यागता जाता है, वैसे-वैसे उसका सामर्थ्य बढ़ता जाता है. अस्तित्त्व पर निर्भर रहें तो कोई फ़िक्र वैसे भी नहीं रह जाती क्योंकि वह हर क्षण हमारे कुशल-क्षेम का भार वहन करता है. जैसे एक नन्हा बालक अपनी सुरक्षा के लिये माँ पर निर्भर करता है, हमारे सभी कार्य यदि हम उस पर निर्भर रहते हुए करेंगे तो उनके परिणाम से बंधेंगे नहीं. हम जो भी करें उसका हेतु सत्य प्राप्ति हो तो सामान्य कार्य भी भक्ति ही बन जाते हैं.