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Wednesday, October 3, 2012

प्रेम ही साधना है


सितम्बर २००३ 
यीशु के उपदेश दिल को छू लेते हैं, प्रेम से छलकता उसका हृदय हमारे हृदयों को स्पंदित कर जाता है. वह गड़रिया है और हम उसकी शरण में हैं, हम उसकी अंगूर की बारी हैं वह हमें रोपता है फिर हमारा ध्यान रखता है. हम उसके आश्रित हों तो वह हमें धरती का नमक भी बना सकता है. वह चुन-चुन कर हमारे दोषों को दिखाता है फिर उन्हें दूर करने को कहता है. वह प्रेम को सर्वोपरि मानता  है, हम सभी मूलतः प्रेम की उपज हैं. यह जगत प्रेम के आश्रित है. यीशु भी भक्त को कान्हा की तरह प्रिय हैं, वैसे ही जैसे कबीर, नानक, तुलसी, और अन्य संत, माँ शारदा, रामकृष्ण परमहंस तथा विवेकानंद. प्रीति ही हमें जगत में स्थिरता प्रदान करती है. प्रीति यदि सच्ची हो तो हृदय को पवित्र बनाती है और उसमें दृढ़ता भी भरती है, तब संसार भयभीत नहीं करता, अज्ञान ही भय का कारण है, और अहंकार ही अज्ञान का कारण है. अहंकारी अंतर प्रेम नहीं कर सकता और न ही उस प्रेम का अनुभव कर सकता है जो दिव्य है, जो किसी बाह्य वस्तु पर आश्रित नहीं है. वह रस अमृत के समान है जिसे एकबार पा लेने के बाद संसारी सुख उसी तरह फीके पड़ जाते हैं जैसे सूर्य निकलने पर चन्द्रमा. ईश्वर की कृपा के बिना यह रस हमें नहीं मिलता. ध्यान के लिए योग्यता और सामर्थ्य हमें प्राप्त नहीं होता. सद्गुरु के कितने उपकार हैं कि उनका ज्ञान एक पथ दिखाता है जिस पर चलकर हम लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, लक्ष्य है-अंतहीन प्रेम..अनंत प्रेम. 

Friday, July 27, 2012

शरण में उसकी आना होगा


 जून २००३ 
जिसका मन स्थिर नहीं है, वह क्षण-क्षण में रुष्ट-तुष्ट होता है, और ऐसे मन का विश्वास नहीं किया जा सकता. हम स्थिर मना बनें यही साधना का लक्ष्य है. भगवद् गीता का मूल उपदेश भी यही है. इसका उपाय भी कृष्ण ने बताया है, परमात्मा में मन लगाएं तो वह अपने आप ही जगत के उतार-चढ़ाव के द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है. एक बार कोई उसकी शरण में आ जाये वह हर पल उसे अपनी निगरानी में रखते हैं, उसके कुशल-क्षेम की जिम्मेदारी ले लेते हैं. फिर वह इधर-उधर जाना भी चाहे तो उसे रास नहीं आता. परमात्मा हमारे मन की गहराई में स्थित है, उसका स्मरण करते करते हम वहीं पहुंचते जाते हैं, जो ज्ञान, प्रेम और सामर्थ्य हमारे भीतर सुप्त है धीरे-धीरे प्रकट होने लगता है. हम वर्तमान में रहना सीख जाते हैं, क्योंकि तब भूत या भविष्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता, हम थे, हम हैं, हम रहेंगे यह भाव दृढ़ होता जाता है. तब यह छोटे-छोटे ताप आदि हमें हिला नहीं पाते. परम रहस्य स्वयं खुलने लगते हैं, भीतर-बाहर उसी एक परमात्मा की सत्ता का दर्शन होता है. उसका प्रेम अनुपम है, वह अवर्णनीय है, वह मात्र अनुभव से ही जाना जा सकता है. उसकी कृपा और सदगुरु का ज्ञान साधक की यही सबसे बड़ी पूंजी होती है.