Showing posts with label नमक. Show all posts
Showing posts with label नमक. Show all posts

Tuesday, November 20, 2012

प्यास जगे जब उसकी भीतर


अक्टूबर २००३ 
दुखों से घबराना कैसा, वे तो नमक की तरह हैं, नमक के बिना जैसे भोजन नहीं रुचता वैसे ही जीवन में चुनौतियाँ न हों तो सुख का आनंद नहीं लिया जा सकता. लेकिन इंसान तब तक तो घबराता ही रहेगा जब तक उसे अपने भीतर सुख नहीं मिलता. जब तक वह यह नहीं जानता कि अखंड लौ की भांति ज्ञान की शिखा उसके भीतर निरंतर जलती रहती है. यह स्थिति किसी को तभी प्राप्त होती है जब सत्य को जानने की उसके भीतर ललक हो, तीव्र आकन्ठा हो, प्यास हो, जीवन के रहस्यों पर से पर्दा उठाने की इच्छा हो. तब आत्मा का सूर्य भीतर चमकता है, और तब सुख-दुःख खेल लगते हैं. ज्ञान हमारे हृदय को निर्भीक बनाता है. हमारा जीवन स्वयं द्वारा रचित है, जो कुछ हमने आजतक किया है उसी का परिणाम है आज का पल, जो हम आज करेंगे वही भविष्य बनाएगा. ज्ञानी ऐसा कुछ नहीं करता जो उसे पछताने के लिए विवश करे. वह सहज ही मुक्त रहता है क्योंकि वह अपने भीतर के आनंद से तृप्त रहता है.

Wednesday, October 3, 2012

प्रेम ही साधना है


सितम्बर २००३ 
यीशु के उपदेश दिल को छू लेते हैं, प्रेम से छलकता उसका हृदय हमारे हृदयों को स्पंदित कर जाता है. वह गड़रिया है और हम उसकी शरण में हैं, हम उसकी अंगूर की बारी हैं वह हमें रोपता है फिर हमारा ध्यान रखता है. हम उसके आश्रित हों तो वह हमें धरती का नमक भी बना सकता है. वह चुन-चुन कर हमारे दोषों को दिखाता है फिर उन्हें दूर करने को कहता है. वह प्रेम को सर्वोपरि मानता  है, हम सभी मूलतः प्रेम की उपज हैं. यह जगत प्रेम के आश्रित है. यीशु भी भक्त को कान्हा की तरह प्रिय हैं, वैसे ही जैसे कबीर, नानक, तुलसी, और अन्य संत, माँ शारदा, रामकृष्ण परमहंस तथा विवेकानंद. प्रीति ही हमें जगत में स्थिरता प्रदान करती है. प्रीति यदि सच्ची हो तो हृदय को पवित्र बनाती है और उसमें दृढ़ता भी भरती है, तब संसार भयभीत नहीं करता, अज्ञान ही भय का कारण है, और अहंकार ही अज्ञान का कारण है. अहंकारी अंतर प्रेम नहीं कर सकता और न ही उस प्रेम का अनुभव कर सकता है जो दिव्य है, जो किसी बाह्य वस्तु पर आश्रित नहीं है. वह रस अमृत के समान है जिसे एकबार पा लेने के बाद संसारी सुख उसी तरह फीके पड़ जाते हैं जैसे सूर्य निकलने पर चन्द्रमा. ईश्वर की कृपा के बिना यह रस हमें नहीं मिलता. ध्यान के लिए योग्यता और सामर्थ्य हमें प्राप्त नहीं होता. सद्गुरु के कितने उपकार हैं कि उनका ज्ञान एक पथ दिखाता है जिस पर चलकर हम लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, लक्ष्य है-अंतहीन प्रेम..अनंत प्रेम.