यह जगत जैसा दिखाई देता है वैसा है नहीं. मन भी जगत का ही एक भाग है, निकट जाकर देखने पर यह विलीन हो जाता है. इसे देखने वाला चैतन्य ही सत्य है, शास्त्रों की यह उक्ति तभी सत्य सिद्ध होती है। सागर में हज़ार लहरें उठती हैं, छोटी-बड़ी, ऊँची-नीची लहरें, पर उनका अस्तित्त्व ज़्यादा देर नहीं टिकता। सागर जिस पानी से बना है वह पानी कभी नहीं मिटता। यदि पानी चेतन होता और स्वयं को लहर मानता तो वह भी स्वयं को मिटता हुआ मान सकता था। हम स्वयं को जानकर ही उस शाश्वत पूर्णता का अनुभव कर सकते हैं, जो व्यर्थ ही वस्तुओं और संबंधों में ढूँढते हैं। जाति, संप्रदाय, धर्म आदि ऊपर-ऊपर के भेदों को छोड़कर भीतर आत्मा के स्तर पर ही शुद्ध प्रेम का अनुभव किया जा सकता है। परमात्मा निरंजन व असंग है, वह पूर्ण है, मुक्त है, चैतन्य है, जब-जब वह राम, कृष्ण या किसी सद्गुरू के रूप में धरती पर आता है, उसी ने जल में कमलवत रहने का ढंग सिखाया है। बुद्ध ने कहा था जिस क्षण मुझे ज्ञान हुआ, मैंने हर प्राणी के भीतर बुद्धत्व को देखा। सबके साथ आत्मीयता और एक्य का अनुभव आत्मज्ञान के बिना हो ही नहीं सकता।
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Thursday, May 26, 2022
Sunday, February 26, 2017
एक यात्रा है मन की
२७ फरवरी २०१७
मानव का मन एक सीढ़ी है, जिससे ऊपर भी जाया जा सकता और नीचे भी. यह एक पुल है जिससे संसार तक भी जाया जा सकता है और परमात्मा तक भी. ऊर्जा एक ही है. जब मन नीचे के केन्द्रों में रहता है तब जिस दुःख और पीड़ा का अनुभव वह करता है, वह उसी ऊर्जा से निकली है जिससे ऊपर के केन्द्रों में रहकर सुख और आनन्द का भी अनुभव किया जा सकता है. हम शाश्वत सत्य की तरफ मुख करके भी चल सकते हैं और पल-पल बदलने वाले मिथ्या जगत की ओर भी. यह सदा याद रखना होगा कि मन को भरा नहीं जा सकता क्योंकि मन नाम ही उसी का है जो कभी संतुष्ट नहीं होता, अन्यथा जगत में इतना विकास न दिखाई देता. मन एक ऊर्जा है और उसका न विनाश किया जा सकता है न उत्पन्न किया जा सकता है, हाँ उसको दिशा दी जा सकती है. दोनों दिशाएं हमारे भीतर ही हैं और पलक झपकते ही हम अपनी दिशा को बदल सकते हैं. कृष्ण कहते हैं दुराचारी से दुराचारी व्यक्ति भी किसी क्षण यदि सत्य की और बढ़ता है तो उसे भी सत्य प्राप्त होता है. आत्मा पूर्ण स्वतंत्र है कि वह कौन सा मार्ग चुने, परमात्मा अनंत धैर्यशाली है, वह सदा ही हमारी प्रतीक्षा करता है, वह सदा उपलब्ध ही है, हमें ही उसकी ओर दृष्टि करने की देर है.
Thursday, April 9, 2015
हर दुःख मिटता ज्ञान से
दिसम्बर २००८
साधक वही है
जो विवेक का उपयोग करके अपने भीतर व बाहर को हर दुःख से सुरक्षित करना चाहता है.
दुःख के दो ही कारण हैं पहला अज्ञान दूसरा इच्छा. मन से पार जो परम तत्व है उसमें
स्थित हो जाना ही ज्ञान है, परम विवेक है. विवेक नित्य-अनित्य में भेद करना सिखाता
है. अनित्य के पीछे भागना मानो परछाई के पीछे भागना है, जिसमें दुःख ही मिलता है.
नित्य की तलाश में जाना भी नहीं पड़ता, अनित्य को छोड़कर जो शेष रहता है वही ‘वह’
है. जिस क्षण हमें लगे कि इस जग में कुछ भी पाने योग्य नहीं रह गया है तो जो भाव
भीतर बचे वही परमात्मा है. जिस क्षण लगे कि इस जग में सभी कुछ अनित्य है,
परिवर्तनशील है, अनित्य पर विश्वास करना स्वयं को धोखा देना ही है. विश्वास केवल
उस एक तत्व पर किया जा सकता है जो नित्य है, शाश्वत है, जिसकी झलक ध्यान में मिलती
है, जो हर वक्त हमारे साथ है, तो उससे मुलाकात हो गयी.
Monday, December 15, 2014
जब जैसा तब वैसा रे
जुलाई २००७
जो नश्वर को जानता है, वह
शाश्वत है. वही हम हैं. हम अपने तन में होती संवेदनाओं को देखते हैं जो
देखते-देखते नष्ट हो जाती हैं, क्योंकि वे नश्वर थीं. हमारे मन में उठने वाली
प्रत्येक भावना, कल्पना, विचार नश्वर है, हम जो उनके साक्षी हैं, शाश्वत हैं. हम
व्यर्थ ही मन की इन कल्पनाओं को सत्य मानकर स्वयं को सुखी-दुखी करते रहते हैं.
हमें तो इन्हें ये जब जैसी हैं, वैसी मानकर आगे बढ़ जाना चाहिए. ये तो जाने ही वाली
हैं !
Monday, May 12, 2014
मिल कर भी जो कभी न मिलता
संतजन
कहते हैं, शिव तत्व सृष्टि के कण-कण में है, वह हमारे भीतर भी है, उसे जगाना ही
वास्तविक पूजा है. जब मन में कामनाओं, वासनाओं तथा महत्वाकांक्षाओं का जाल न फैला
हो, मन खाली हो तब वह शिव तत्व जो पहले से ही वहाँ है, प्रकट हो जाता है. हमारी
शुद्ध चेतना उसी से बनी है. वह प्रेम है, सौन्दर्य है, कल्याणकारी है, अखंड है,
निर्दोष है, शाश्वत है, निर्द्वन्द्व है, ज्ञान स्वरूप है. उस शिव तत्व को एक बार
जान लेने के बाद उसका विस्मरण नहीं होता, उसके रहस्य धीरे-धीरे करके खुलते हैं लेकिन
कभी पूरे नहीं होते. वह जान कर भी जाना नहीं जाता, वह अनुभव की वस्तु नहीं, शब्दों
में नहीं आता, पर एक बार जिसे उसकी झलक भी मिल गयी वह स्वयं को तृप्त अनुभव करता
है. पर यह तृप्ति उसकी प्यास को बढ़ाती है, जगत की प्यास को मिटा देती है.
Friday, September 21, 2012
सहज हुआ जो स्वयं को जाने
हमारा जीवन जो बाहर-बाहर है, क्षणभंगुर है, वहाँ सभी कुछ बदल रहा है, जो सीखा हुआ
है, पर जो भीतर है, जो हम अपने साथ लेकर ही आये हैं, वह शाश्वत है. जब हम उस
शाश्वत की ओर नजर डालते हैं तभी जीवन में फूल खिलते हैं. देह, मन, बुद्धि और
इन्द्रियों से परे एक चेतन सत्ता..जो निर्दोष है, शुद्ध है पर हम उसे देखते ही
नहीं, एक शिशु कोरा पैदा होता है, जगत उसे सिखाता है, लेकिन इस सीखे हुए ज्ञान के कारण
उस ओर कभी उसकी नजर नहीं जाती, जो वह लेकर ही आया था, प्रेम, शांति और आनंद शिशु
के पास होते ही हैं, पर वयस्क होते-होते वे कहीं खो जाते हैं, वे छिप जाते हैं. ‘ध्यान’
से वे उभर आते हैं, तब हमारी सारी चेष्टाएं निष्काम होती हैं, हम अलिप्त रहकर जीना
सीख जाते हैं. हम अपने स्वभाव को प्राप्त हो जाते हैं.
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