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Tuesday, May 19, 2015

एक रहस्य ही है जीवन

फरवरी २००९ 
ध्यान का फल ज्ञान है, संसार में हमें जिसका ज्ञान मिल जाता है, ध्यान हट जाता है, क्योंकि ध्यान ज्ञान बन जाता है. वैज्ञानिक में भी योगी जैसे एकाग्रता होती है. योगी का ध्यान हटता नहीं क्योंकि परमात्मा हमेशा रहस्य बना रहता है, वह हर कदम पर आश्चर्य उत्पन्न होने की स्थिति पैदा कर देता है ! जितना ज्ञान मिलता है उतना ही अज्ञानी होने का भाव दृढ़ होने लगता है. पदार्थ में जोड़ा ज्ञान व्याकुलता को जन्म देता है, क्योंकि अब जानने को कुछ नहीं बचा और जो सब कुछ है उसका ज्ञान मिला नहीं है. अपनी इस व्याकुलता को भूलने के लिए मानव क्या-क्या नहीं करता, वह इधर-उधर के कामों में स्वयं को लगाये रखकर उस प्रश्न से बचना चाहता है. वह जगत को दोनों हाथों से बटोर कर अपनी मुट्ठी में कैद करना चाहता है, पर वह कर भी नहीं पाता क्योंकि जगत में सभी कुछ नश्वर है. तब भी हम जागते नहीं बल्कि नींद के उपाय किये जाते हैं. योग ही इस नींद से जगाता है. 

Monday, December 15, 2014

जब जैसा तब वैसा रे

जुलाई २००७ 
जो नश्वर को जानता है, वह शाश्वत है. वही हम हैं. हम अपने तन में होती संवेदनाओं को देखते हैं जो देखते-देखते नष्ट हो जाती हैं, क्योंकि वे नश्वर थीं. हमारे मन में उठने वाली प्रत्येक भावना, कल्पना, विचार नश्वर है, हम जो उनके साक्षी हैं, शाश्वत हैं. हम व्यर्थ ही मन की इन कल्पनाओं को सत्य मानकर स्वयं को सुखी-दुखी करते रहते हैं. हमें तो इन्हें ये जब जैसी हैं, वैसी मानकर आगे बढ़ जाना चाहिए. ये तो जाने ही वाली हैं !

Tuesday, July 5, 2011

अनंत की चाह


अगस्त २००० 
मन की आसक्ति को, चाह को, प्रेम को अगर दिशा मिल जाये, भावनाओं को विचारों को केन्द्र मिल जाये तो जीने की कला अपने आप ही आ जाती है, यदि चाह नश्वर की हो तो सुख भी नश्वर ही तो मिलेगा, मन में अनंत की चाह हो तभी अनंत की ओर कदम बढ़ेंगे. जहाँ योग नहीं वहाँ भोग होगा और रोग भी हो सकता है. जहाँ राम नहीं वहाँ कामनाएँ होंगी जो अशांति का कारण बनेंगी... जीवन का संघर्ष द्वंद्वात्मक है, किन्तु परमात्मा सदा एक सा है.