आज यह विचार करने की बहुत ज़रूरत है कि वास्तव में स्वाधीनता क्या है? क्या राजनीतिक रूप से स्वाधीन देश में निवास करने मात्र से हम स्वयं को स्वाधीन मान सकते हैं ? जब तक हम मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं होते, स्वाधीनता भ्रम ही बनी रहती है। किसी का मन यदि भय से ग्रस्त है, दूसरों से तुलना करता है, सदा कुछ न कुछ पाने की फ़िराक़ में लगा रहता है, तो वह मन परतंत्र ही कहा जायेगा। जब हम भीतर अतृप्त बने रहते हैं, जीवन की दौड़ में स्वयं को पिछड़ गया मानते हैं, तो हम उस मानसिकता के ग़ुलाम हैं, जो जीवन को एक संघर्ष में बदल देती है। जीवन एक कला है, कोई युद्ध नहीं। जिस भी परिस्थिति में किसी को रखा गया है, वह उसके विकास के लिए कोई न कोई रास्ता अवश्य दिखाती है। किंतु जो मन मुक्त नहीं है, वह इस खुले द्वार को देख ही नहीं सकता। जीवन हमारे चारों ओर हवा और धूप की तरह बिखरा है, लेकिन हम उसकी ओर नज़र नहीं उठाते। जीवन ऊर्जा श्वासों के रूप में दिन-प्रतिदिन क्षीण हो रही है, उसकी भरपाई के रूप में हमारे ऋषियों ने ध्यान-प्राणायाम की अद्भुत विद्या सिखायी है। जिसके द्वारा हम जीवन के स्रोत से जुड़ सकते हैं और स्वयं के भीतर मुक्ति का द्वार पा सकते हैं। मृत्यु यदि जीवन का अंत है तो जीवन, मृत्यु का भी अंत हुआ। इस रहस्य को भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं। आत्मा शाश्वत है, आत्मा ही वह जीवन है जो मृत्यु का अंत है। ध्यान में हम उसी आत्मा का अनुभव करते हैं, वहीं सच्ची मुक्ति का अहसास होता है। वहाँ कोई दूसरा नहीं है, इसलिए भय, तुलना, आगे-पीछे, छोटा-बड़ा भी कुछ नहीं है। वहाँ हर व्यक्ति स्वतंत्र है, तब स्वयं पर शासन करने की विधि ज्ञात होती है। हमारे शास्त्र हमें इसी मोक्ष की याद बार-बार दिलाते हैं।
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Sunday, August 16, 2026
Thursday, March 14, 2019
मन होगा वैरागी जब
आत्मा की सबसे बड़ी मांग है स्वाधीनता. हर दुःख किसी न किसी
प्रकार की पराधीनता का द्योतक है. हम अपनी इच्छाओं के गुलाम होकर जीते हैं और किसी
न किसी प्रकार उन्हें पूर्ण करना चाहते हैं. यदि वे पूर्ण हो जाती हैं तो सुख उस
स्वाधीनता का होता है जो उस इच्छा से मुक्त होकर हमें मिलता है न कि उस वस्तु के
मिलने का जिसकी चाह पूरी हो गयी. जो इच्छा पूर्ण नहीं होती उसकी गुलामी हमें सहनी
पड़ती है. शास्त्रों में कहा गया है, वैराग्यवान को कौन सा सुख नहीं मिलता? क्योंकि
वह किसी की पराधीनता स्वीकार नहीं करता वह मुक्ति के सुख का अनुभव करता है. ध्यान में जो सहज आनंद साधक को मिलता है वह भी इसी क्षणिक
मुक्ति का परिणाम है. यदि कोई नियमित ध्यान साधना करता रहे तो धीरे-धीरे सभी
इच्छाएं सूखे पत्तों की तरह गिरने लगती हैं. पहले व्यर्थ हटता है फिर एक अवस्था
ऐसी आती है जब जो आवश्यक हो अपना आप ही उसे प्राप्त होने लगता है, किसी इच्छा की
आवश्यकता ही नहीं रहती.
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