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Monday, March 6, 2017

बनें साक्षी हर द्वंद्व के

७ मार्च २०१७ 
जीवन द्वंद्वों से गुंथा है, दिन-रात, सुबह-शाम, धरा-आकाश, स्वर्ग-नर्क, सुख-दुःख, अपना-पराया कितने सारे जोड़े हैं जिनसे हम प्रतिदिन दो-चार होते हैं. हमारी कठिनाई यही है कि हम सुख चाहते हैं, दुःख नहीं, स्वर्ग के गीत गाते हैं नर्क से मुँह फेरते हैं, अपनों के लिए आँखें  बिछाते हैं, पराये से कोई मतलब नहीं, पर जीवन ऐसा होने नहीं देता, वह सदा जोड़ों में ही मिलता है. हर सुख की कीमत दुःख के रूप में देर-सवेर चुकानी ही है. स्वर्ग का मार्ग नर्क से होकर ही गुजरता है. कोई अपना कब पराया बन जायेगा पता ही नहीं चलता. क्या  इसका अर्थ हुआ कि जीवन हमें छल रहा है ? नहीं, जीवन हमें द्वन्द्व से पार जाने का  एक अवसर दे रहा है, क्योंकि  उसके पार ही ही है वह महाजीवन जिसे कोई परमात्मा कहता है कोई, खुदा ! जब तक हम सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी के साक्षी बनकर उनसे प्रभावित होना त्याग नहीं देते, सहज आनंद की धारा में, जो अनवरत अस्तित्त्व बहा रहा है भीगने से हम वंचित ही रह जाते हैं.

Friday, June 24, 2011

जीवन



जून २००० 
सार्थक जीवन, सही मायनो में जीना अथवा वास्तविक जीवन क्या है, यह प्रश्न हर कोई कभी न कभी  खुद से पूछता है. जीने को तो हम सभी जिए चले जा रहे हैं. लेकिन अपनी सारी योग्यताओं, क्षमताओं को पहचाने बिना, हमें अपने सामर्थ्य का ज्ञान ही नहीं है. जीवन की गहराई में गए बिना एक अधूरा-अधूरा सा उथला-उथला सा जीवन जीते जाते हैं कि जीवन की शाम हो जाती है. कितने ही निराधार भय, अनेकों व्यर्थ दुश्चिंताएं, व्यर्थ की कल्पनाएँ करते रहते हम अपने आस-पास की सच्चाई को नहीं देखते. बस कल्पना के असत्य को ही सत्य मान कर उसके पीछे दौड़ते रहते हैं. सत्य ठोस और स्थूल नहीं होता सो हम उसे देख नहीं पाते. मन को व्यर्थ के झाड़-झंखाड़ से भरे उन्हीं कंटीली पगडन्डियों पर उलझते चलते रहते हैं. अपने को सीमा में बांध हम एक कैदी का सा जीवन व्यतीत करते हैं, जबकि हमारे भीतर उन्मुक्त गगन में उड़ने की क्षमता मौजूद है. बस जागरण की ओर कदम बढ़ाने भर की देर है.