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Tuesday, May 17, 2022

जीवन का आधार वही है

जीवन अमूल्य है, परमात्मा का उपहार है, वही इसका आधार भी है. हमें उसे ही जानना है जो इस देह और मन के भीतर ज्योति जलाकर बैठा है. यह जगत शरीर को चलाने और परमात्मा का ज्ञान पाने के लिए एक साधन है. परमात्मा सद्गुरु के रूप में बार-बार धरा पर अवतरित होते हैं. कृपा की फुहार बरसाते हैं. कृपा का अनुभव होते ही साधक का जीवन एक उत्सव बन जाता है. गूंगे की मिठाई की तरह यह अनुभव अंतर को रस से भर देता है. तब भीतर उजाला ही उजाला भर जाता है, जिसमें सभी कुछ स्पष्ट हो जाता है, कहीं कोई संशय नहीं रहता. यदि हम उसे अपने जीवन रूपी रथ को हांकने के लिए कहें तो वह तत्क्षण तैयार हो जाते हैं. वह हमारी चेतना की मूर्छा को दूर करते हैं. जीवात्मा रूपी अर्जुन जब-जब परमात्मा रूपी कृष्ण को अपना गुरु बनाता है तो वह उसे प्रेरित करते हैं, ज्ञान प्रदान करते हैं, ध्यान की विधि बताते हैं. अनेकों उपायों से वह साधक की सुप्त चेतना को जागृत करते हैं. अहंकार का आवरण दूर होते ही सत्य का साक्षात्कार होता है. 

Sunday, May 9, 2021

अमर आत्मा नश्वर है तन

 अर्जुन जिस विषाद योग में स्थित था आज उसी में हममें से हरेक स्थित है. युद्ध की स्थिति जितनी भयावह हो सकती है, उसी तरह की एक स्थिति, एक अदृश्य विषाणु से युद्ध की स्थिति ही तो आज विश्व के सम्मुख खड़ी है. अर्जुन को अपने गुरु, पितामह, चाचा, मामा, श्वसुर, भाइयों  तथा अन्य संबंधियों की मृत्यु का भय था. वह कहता है जब ये सब ही नहीं रहेंगे तब मैं युद्ध जीतकर भी क्या करूंगा. युद्ध न करने की बात कहकर जब वह धनुष रख देता है तब कृष्ण उसे आत्मा की अमरता का संदेश देते हैं. आत्मज्ञान पाना हो तो जीवन में ऐसा ही तीव्र संवेग चाहिए. जब कोई भी संवेदना चरम पर पहुंच जाती है तब मन ठहर जाता है और ग्रहणशील बनता है. आज हमारा मन ऐसी ही पीड़ा का अनुभव कर रहा है. कितने ही परिचित, अपरिचित जब सदा के लिए मौन हो रहे हैं तब भीतर यह प्रश्न उठता है कि अब क्या होने वाला है. गीता में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ये सब राजा इस जन्म से पहले भी थे, और बाद में भी रहेंगे. जीवन पहले अप्रकट होता है मध्य में प्रकट होता है फिर अप्रकट हो जाता है. ज्ञानी जीवित और मृत दोनों के लिए शोक नहीं करते. युद्ध में जहाँ लाखों लोग अपने प्राण हथेली पर लेकर आये थे, ऐसा उपदेश देकर कृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की शाश्वतता का बोध कराया. आज हरेक को उस ज्ञान को याद करना है. मानवता के इतिहास में ऐसी भीषण परिस्थितियां यदा-कदा ही आती हैं जो सामान्य जन को जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती हैं. 


Tuesday, January 5, 2021

कर्ताभाव का त्याग करे जो

भगवद्गीता में एक जगह अर्जुन ने कृष्ण से पूछा है, ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है ? और कर्म क्या है ? कृष्ण कहते हैं जो परम है अर्थात सर्वश्रेष्ठ है; जो  अक्षर है अर्थात अविनाशी है; वही ब्रह्म है. हम अपने आसपास वस्तुओं को नित्य बनते-नष्ट होते देखते हैं, लोगों को जन्मते व मरते देखते हैं, क्या ऐसा कुछ है जो कभी नष्ट नहीं होता. वास्तव में वस्तुएं अपना रूप बदल लेती हैं, बीज नष्ट होता है तो वृक्ष बन जाता है, वृक्ष नष्ट हो जाता है तो अंततः खाद बनकर मिट्टी में ही मिल जाता है. विज्ञान में हमने पढ़ा है कि ऊर्जा और पदार्थ न बनाये जा सकते हैं न नष्ट किये जा सकते हैं, केवल उन्हें परिवर्तित किया जा सकता है. ब्रह्म ऐसा पदार्थ या ऊर्जा है जो सदा एक सा है. दूसरे प्रश्न के उत्तर में कृष्ण कहते हैं, स्वभाव ही अध्यात्म है. हर प्राणी का मूल स्वभाव जो शिशु जन्म से अपने साथ लेकर आता है, अध्यात्म है. जब तक बच्चा भाषा नहीं सीख लेता वह स्वभाव से ही संवाद करता है, प्रकृति में सभी जीव उसी मूल स्वभाव से जुड़े हैं, एक बिल्ली अथवा कुत्ते को कैसे ज्ञात हो जाता है कि उसे स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए कौन सा पत्ता खाना है. संत मौन से ही वृक्षों के साथ संवाद कर लेते हैं क्योंकि वह निज स्वभाव में रहते हैं. कर्म की परिभाषा में कृष्ण कहते हैं, भूतों के भाव का त्याग ही कर्म है, अर्थात जब हम अपने मूल स्वभाव से हट हो जाते हैं तो कर्ता भाव में आ जाते हैं. कितने ही साधक कहते हैं साधना काल में मन शांत रहता है पर कर्म करते समय मन विचलित हो जाता है. इसका अर्थ है कि हम अध्यात्म से नीचे उतर गए. इसीलिए कृष्ण निष्काम कर्म करने के लिए कहते हैं जो आत्मा में स्थित रहकर किया जा सकता  है तथा जिसका कोई बन्धन नहीं होता. 

 

Monday, February 18, 2019

गुह्यतम ज्ञान सुनो भई साधो


१९ फरवरी २०१९ 
भगवद गीता में कृष्ण अर्जुन को पहले गुह्य ज्ञान देते हैं, फिर गुह्यतर ज्ञान देते हैं और अंत में गुह्यतम ज्ञान देते हैं. ये तीनों ज्ञान क्रमश हमारे भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अति आवश्यक हैं. ईमानदारीपूर्वक जीवन यापन करने वाला एक सामान्य व्यक्ति जो भले ही किसी व्रत, उपासना आदि को नहीं करता हो, इस गुह्य ज्ञान का अधिकारी है, उसे कर्मयोगी कहा जा सकता है.  वह अपने सभी दायित्वों को भली प्रकार निभाए, कोई ऐसा कार्य न करे, जिससे उसके यश की हानि हो, कोई भी निषिद्ध कर्म कभी न करे. गुह्यतम ज्ञान का अधिकारी वह है, जो व्यक्ति अपने लाभ के लिए ईश्वर की भक्ति करता है, उसकी किसी परम शक्ति में आस्था है और उसका विश्वास है कि व्रत, उपासना, ध्यान, जप, तप आदि के करने से उसकी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं, वह भक्ति योगी है. गुह्यतम ज्ञान ज्ञानी के लिए है, जिसे अपने शाश्वत स्वरूप का अनुभव हो गया है, जो स्वयं को मन, बुद्धि अहंकार से पृथक आत्मा के रूप में जानना चाहता है. ज्ञानी के भीतर भक्ति और कर्म दोनों समाहित हैं, भक्त के भीतर कर्मयोगी समाहित है और कर्मयोगी के भीतर भक्ति और ज्ञान का बीज पड़ा है जो समय आने पर अंकुरित होगा.

Friday, September 21, 2018

तू प्यार का सागर है


२२ सितम्बर २०१८ 
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, तुम मेरे प्रिय हो, तुम निष्पाप हो, इसलिए मैं तुमसे यह ज्ञान कहूँगा. हर साधक अर्जुन है और परमात्मा की नजरों में प्रिय भी. कैसी अद्भुत है उसकी शक्ति, वह एक होकर हजारों आत्माओं को अपना निस्वार्थ प्रेम दे सकता है. हम अपने निकटस्थ दो-चार को भी सहज प्रेम देने में कृपणता का अनुभव करते हैं. परमात्मा की दृष्टि में हम सभी आत्माएं हैं, जिन्हें वह अपने समान ही देखना चाहता है, शुद्ध और मुक्त...वह उन सभी को जो उससे प्रेम करते हैं और मार्गदर्शन चाहते हैं, सदा सन्मार्ग दिखाता है. अंतर्प्रेरणा के रूप में वह साधक को सचेत करता है. प्रेम करना उसका स्वभाव है, बल्कि वह प्रेम स्वरूप ही है, उसकी ओर एक कदम रखते ही शांति की लहरों का मधुर कलकल सुनाई देने लगता है. इस जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है, और उसकी सत्ता में कुछ भी अस्थिर नहीं है, वह अचल, अडोल और अच्युत है. उसे हम आज पुकारें, कल पुकारें, एक वर्ष बाद पुकारें या एक युग बाद, वह सदा उसी तरह स्वागत करता हुआ मिलेगा. इसीलिए वह मीरा का भी उतना है जितना राधा का.

Tuesday, June 13, 2017

भगवद् गीता किञ्चिदधीता

13 jun 2017 
भगवद गीता पूजा की पोथी नहीं है, ग्रंथालय की शोभा नहीं है. भगवान का गीत है, ब्रह्म और जीव का अद्भुत संवाद है. ज्ञान रूपी अनंत अलौकिक खजाना है. निज स्वरूप में अवस्थित होकर जीवन जीने की कला है. चैतन्य का बहता हुआ झरना है यह, शब्दों के जंजाल से मुक्त होकर यदि कोई इस प्रवाह का अनुभव कर सके तो वह चैतन्य के साथ एकत्व का अनुभव कर सकता है. हजारों वर्ष पूर्व यह ज्ञान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था पर यह नित नवीन है. सदियाँ बीत जाती हैं पर ज्ञान नहीं बदलता. यह मोक्ष शास्त्र है.

Sunday, March 4, 2012

कृष्ण कथा अमृत


जनवरी २००३ 

भागवद् महापुराण में कृष्ण की कथा है, बल्कि कहना चाहिए कि कृष्ण कथा का अमृत है भागवद्,  जिसे पढ़कर कृष्ण के प्रति अथाह प्रेम उमड़ता है. वह इतनी प्यारी बातें कहते हैं अपने ग्वालबाल मित्रों से, गोपियों से, सखा उद्धव से और मित्र अर्जुन से कि बरबस उनपर प्यार आता है. वह सभी को निस्वार्थ भाव से प्रेम करते हैं बिना किसी प्रतिदान की आशा के, एकांतिक प्रेम ! और जो उन्हें प्रेम करता है उसे वह अभयदान देते है, वह उनके निकट आकर निर्भय हो जाता है. वह सम्पूर्ण प्रेम, ज्ञान और प्रेम के आगार हैं.... वास्तव में वह जो हैं उसकी कल्पना भी कर पाना हमारे लिये कठिन है. हम एक बार प्रेम से उनका नाम भी उच्चारित करते हैं तो हृदय में कैसी हिलोरें उमड़ती हैं. उनका नाम और वह अभिन्न हैं. वह भक्त की हर बात सुनते हैं, सारी छोटी-बड़ी कामनाएं उन पर उजागर हैं, सारी कमियों के वह साक्षी हैं, उसका प्रमाद व लापरवाही भी उनसे छिपी नहीं है और भक्त का प्रेम भी....