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Monday, September 11, 2017

लौट सकेगा जब मन भीतर

१३ सितम्बर २०१७ 
भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं, जैसे कछुआ संकट आने पर अपने अंगों को भीतर सिकोड़ लेता है और उसके कठोर तन पर किसी चोट का असर नहीं होता, वह अपने को बचा लेता है. इसी तरह मन भी यदि किसी संकट के आने पर स्वयं को सिकोड़ना सीख ले, अपने भीतर एक ऐसा स्थान बना ले जहाँ जाकर बाहरी घटनाओं के असर से बचा जा सकता है तो मन भी स्वयं की रक्षा आसानी से कर लेता है. मन पर संकट आने का अर्थ है, उसका विकार ग्रस्त हो जाना, उसका चिंताग्रस्त हो जाना अथवा दुर्बल हो जाना. मन की रक्षा का अर्थ है समता में रहने की उसकी कला का विकास. यदि छोटी-छोटी बातों से मन कुम्हला जाता है तो देह भी स्वस्थ नहीं रह सकती. मन के आकुल-व्याकुल होते ही अंतस्रावी ग्रन्थियों से ऐसे स्राव निकलते हैं जो देह को रोगग्रस्त कर सकते हैं. मन की गहराई में स्थित एक स्थान जहाँ जाकर पूर्ण विश्राम मिलता है, वही उसका आश्रय स्थल है. नियमित ध्यान करने से इस स्थल पर जाने का मार्ग सहज हो जाता है.  

Tuesday, June 13, 2017

भगवद् गीता किञ्चिदधीता

13 jun 2017 
भगवद गीता पूजा की पोथी नहीं है, ग्रंथालय की शोभा नहीं है. भगवान का गीत है, ब्रह्म और जीव का अद्भुत संवाद है. ज्ञान रूपी अनंत अलौकिक खजाना है. निज स्वरूप में अवस्थित होकर जीवन जीने की कला है. चैतन्य का बहता हुआ झरना है यह, शब्दों के जंजाल से मुक्त होकर यदि कोई इस प्रवाह का अनुभव कर सके तो वह चैतन्य के साथ एकत्व का अनुभव कर सकता है. हजारों वर्ष पूर्व यह ज्ञान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था पर यह नित नवीन है. सदियाँ बीत जाती हैं पर ज्ञान नहीं बदलता. यह मोक्ष शास्त्र है.

Monday, August 8, 2011

ईश्वरीय योग


अगस्त २००१ 
भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि योग को प्राप्त हुआ व्यक्ति सुख-दुःख, हानि-लाभ, मान-अपमान अदि द्वंद्वों में सम रहता है. हम अपने जीवन को देखें तो जब भी हम सांसारिक विषयों के बारे में बात करते हैं तो हानि-लाभ की तराजू में टोल कर करते हैं, अपने विषय में बात करते हैं तो विषाद या आत्मप्रशंसा के अतिरिक्त कोई तीसरा भावआता ही नहीं. दूसरों के बारे में बात करते हैं तो भी हम तटस्थ नहीं रह पते, निंदा या स्तुति के भाव से घिरे रहते हैं, और असत्यभाषी भी हो जाते हैं. सर्वोत्तम यही है कि हम ऐसे विषयों का चिंतन करें जो भगवद्भाव से जुड़े हों. जिसमें समता बनी ही रहेगी, जैसे परहित, परोपकार, स्नेह और पवित्रता से जुड़े भाव. अपने विचारों, कर्मों, व वाणी के प्रति प्रतिपल सजग रह कर ही कोई योग को प्राप्त हो सकता है.