जगत में विविधता है, रूप, रंग,
गंध, ध्वनि और स्वाद के न जाने कितने विषय हमारे चारों ओर बिखरे हैं. आँख को एक
दृश्य दिखाएँ या हजार, उसे कोई भार नहीं लगता. नासिका ने हजारों गंध का ज्ञान
ग्रहण किया है पर एक और गंध लेने के लिए उसे कोई प्रयास नहीं करना पड़ता. इसी
प्रकार मन जो इन्द्रियों के द्वारा दिखाए गये ज्ञान को ग्रहण करता है, न जाने
कितने जन्मों से यह कार्य कर रहा है, उसे कभी असुविधा नहीं होती, हर दिन नये-नये
विषयों का ज्ञान प्राप्त करने की उसकी आकांक्षा को कोई बाधा नहीं पड़ती. यहाँ तक की
बात जो समझ लेता है वह मन के हजार चिन्तन करने पर भी स्वयं को सहज अवस्था में रख
पाने में समर्थ हो जाता है. मन में एक विचार आये या हजार विचार आयें, यदि हम स्वयं
को मन से परे एक सत्ता के रूप में अनुभव कर सकते हैं, उसी तरह जैसे रूप से परे आँख
है और आँख से परे मन है, तो हम सदा अपने निर्विकार रूप में बने ही रहते हैं. जीवन
में रहकर भी कमल की तरह अलिप्त.
Showing posts with label इन्द्रियां. Show all posts
Showing posts with label इन्द्रियां. Show all posts
Sunday, August 25, 2019
Tuesday, July 10, 2018
जब आवे संतोष धन
११ जुलाई २०१८
संत कहते हैं, जैसे सागर में मछलियाँ और हवा में पंछी सहज ही
निवास करते हैं, हमारी चेतना परम चैतन्य के महासागर में सदा ही स्थित है. हम मन के
द्वारा विचार करते हैं, इन्द्रियों के द्वारा इस जगत का अनुभव करते हैं. अनुभव और
जिसका अनुभव किया अर्थात यह जगत हमें इतना प्रभावित करता है कि हम इस बात पर कभी
ध्यान ही नहीं देते कि अनुभव करने वाला कौन है. अनुभव करने वाली चेतना सदा ही परम
में स्थित है. पहले ध्यान के द्वारा मन से सारे अनुभवों से मुक्त करना है, उस क्षण
में अनुभव कर्ता स्वयं का अनुभव करेगा, और जब दीर्घ काल तक चेतना स्वयं में ठहरना सीख
जाएगी, शुद्ध चैतन्य का अनुभव भी होगा. संत और शास्त्र कहते हैं, इस अनुभव के बाद जो
सहज शांति और संतुष्टि मन को मिलती है, वह किसी कारण से विलुप्त नहीं होती,
क्योंकि वह परम से उपजी है जो अजर और अमर है.
Monday, August 21, 2017
जग जैसा जब देखें वैसा
२१ अगस्त २०१७
प्रत्येक आत्मा में ज्ञान पाने की सहज कामना होती है, एक बच्चा भी जन्मते ही अपने
आस-पास के वातावरण से परिचित होना चाहता है. ज्ञान इन्द्रियों तथा मन के रूप में
हमें जानने के सुंदर साधन प्राप्त हुए हैं, जिनके माध्यम से हम जगत को जानते हैं.
जानने के इस क्रम में हम जगत के बारे में कई धारणाएं अथवा मान्यताएं बना लेते हैं,
जिनका कोई प्रमाण हमारे पास नहीं होता, जिसके कारण हमें कष्ट उठाना पड़ता है. यदि
हमारे पास अपनी धारणा के पक्ष अथवा विपक्ष में कोई प्रमाण नहीं है, तो हम उस बात
को न तो स्वीकार करें न ही अस्वीकार. उस स्थिति में हम तटस्थ रहकर ही स्वयं की
रक्षा कर सकते हैं. इस जाननेवाले को जानने के लिए हमें इन साधनों को शुद्ध करने
की आवश्यकता है, मन जितना शुद्ध होगा उतना
ही एकाग्र होगा. एकाग्र मन में जानने वाला यानि आत्मा अपने प्रतिबिम्ब को उसी तरह देख
लेता है, जैसे शान्त झील में हम उसकी तलहटी को देख लेते हैं.
Labels:
आत्मा,
इन्द्रियां,
झील,
डायरी के पन्नों से,
मन,
साधन
Monday, May 8, 2017
मन जो लौट गया निज घर में
८ मई २०१७
मन जब भीतर जाकर अपने आप में ठहर जाता है तो विचारों के स्रोत से परिचय होता है. ऐसा अनुभव अतुलनीय है, भीतर से कुछ उमड़ कर बाहर उलीचने का मन होता है. पहली बार एक तृप्ति का अहसास होता है जो किसी भी भौतिक वस्तु पर आधारित नहीं है. सभी इन्द्रियां बाहर ही देखती हैं, मन ही ऐसा अनुपम साधन है जो बाहर और भीतर दोनों ओर जा सकता है. जिस क्षण जगत से सुख लेने की चाह न रहे मन स्वयं में लौट ही आयेगा. मन तब स्वनिर्भर होना सीखेगा, जितना-जितना स्व की महिमा का उसे भान होगा उतना-उतना वह भीतर से पूर्ण होता जायेगा. फकीर भी स्वयं को बादशाह मानते हैं क्योंकि उन्हें अपने सुख के लिए जगत से कुछ नहीं चाहिए.
Sunday, December 21, 2014
झूठा है हर बंधन
जुलाई २००७
जब जड़ व चेतन मिलते हैं
तभी अहंकार उत्पन्न होता है, जब यह ज्ञान हो गया कि दोनों कभी मिले ही नहीं, मिलने
का भ्रम मात्र होता है तो अहंकार कैसे उत्पन्न होगा. अहंकार के न रहने पर न कोई
कर्ता है न भोक्ता है. जो कुछ हो रहा है वह होना था किन्हीं कारणों वश, जैसे प्रकृति
में सारे काम हो रहे हैं, वैसे ही इन्द्रियां अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं.
मन अपना काम कर रहा है, बुद्धि अपना, फिर व्यर्थ ही स्वयं को बंधन में क्यों
मानें.
Labels:
अहंकार,
इन्द्रियां,
चेतन,
जड़,
डायरी के पन्नों से,
बंधन
Thursday, December 12, 2013
करणीय होता रहे त्याज्य जाये छूट हमसे
मई २००५
ईश्वर
की बनाई इस सृष्टि में हम उसी के प्रतिनिधि हैं, उसने हमें अपने सा सिरजा है, इस
जगत में हम अमृत पुत्रों के समान निडर, निर्भीक तथा प्रेम भरा जीवन व्यतीत कर सकते
हैं. मोह और प्रमाद के कारण ही हम ऐसा नहीं कर पाते और अपनी अपार क्षमताओं से
वंचित ही रह जाते हैं. वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के साथ स्वयं को एक मानना ही
मोह है. प्रयत्न पूर्वक जो करना चाहिए उसकी विस्मृति ही प्रमाद है. धर्म को जानते
हुए भी उसकी ओर न चलना, अधर्म को जानते हुए भी उससे दूर न जाना भी प्रमाद है. मन व
इन्द्रियों की व्यर्थ चेष्टा का नाम भी प्रमाद है. मोह और प्रमाद से मुक्त हुई
आत्मा ही सतोगुण में स्थित होती है. सात्विकता का फल है निर्मलता, रजोगुण से मोह
बढ़ता है, जिसका फल है दुःख. तमोगुण का फल अज्ञान है. धीरे-धीरे हमें सतोगुण से भी
पार जाना है, क्योकि ये तीनों गुण एक दूसरे में बदलते रहते हैं. कृष्ण कहते हैं
गुणातीत ही उनका सच्चा भक्त है.
Subscribe to:
Posts (Atom)