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Wednesday, July 23, 2014

अति मीठी है कथा प्रभु की

नवम्बर २००६ 
भगवद कथा हमारे मन में जाकर हमें हमारे स्वभाव की ओर लौटा ले जाती है. यह तारक है, रोम-रोम को रसपूर्ण कर देती है. आनंद की ऐसी वर्षा करती है कि हृदय भीतर तक भीग जाता है. भीतर जो आनन्द का सृजन करे वह कथा ही तो है, शब्दों के रूप में उसी की प्रतिमा है. कथा से हमें कितना कुछ मिलता है, ज्ञान, भक्ति, प्रेम, रस, प्रेरणा और जीने को सही ढंग से जीने की कला भी भगवद कथा सिखाती है. 

Friday, February 7, 2014

रामकथा सम अमृत नाहीं

जुलाई २००५ 

कितना अद्भुत है वह परमात्मा जो हमारे भीतर छिपा है और प्रेम का ऐसा जाल बिछाता है कि कोमल हृदय उसमें बंध जाता है. ईश्वर का प्रेम अमूल्य है, अनुपम है, अद्भुत है, उसी के कारण तुलसी अमर काव्य की रचना करते हैं, सन्त कथावाचक बनते हैं और श्रोता सुनते-सुनते भाव की गंगा में डूबते उतरते हैं. ईश्वर की कृपा से ही उसका प्रेम मिलता है, सद्गुरु की कृपा से ही ईश्वर की कृपा मिलती है. राम ही आत्मा है, और लक्ष्मण विवेक, सीता प्रज्ञा है और हनुमान ज्ञान. हमारी आत्मा के चारों ओर अभी विवेक की जगह अविवेक है, प्रज्ञा की जगह अविद्या और ज्ञान की जगह अज्ञान, तभी राम भी दूर लगते हैं.

Tuesday, January 7, 2014

तू ही सागर है तू ही किनारा


भगवद कथा हमें अपने स्वरूप में स्थित करने के लिए उपचार है. हमने जो अपने आप को बंधन में पड़ा हुआ मान लिया है, उससे छुड़ाने के लिए औषधि है. हरि ने अपने को अति सुलभ बना कर छिपा लिया है, उस हरि का परिचय कराने कथा आती है. हम जब पाठ करते हैं तो कई अर्थ छिपे रह जाते हैं, किसी सन्त द्वारा कही गयी कथा का श्रवण करने से भीतर जागृति होती है, अहं पिघल कर बह जाता है, सभी कुछ भीग जाता है, हृदय द्रवित हो जाता है. वह हरि प्रेमस्वरूप है, उसके प्रेम की आंच हमारे अंतर को गला देती है, किन्तु भीतर एक शीतलता का अहसास होता है. यदि ऐसा न हो तो हमारा सुनना व्यर्थ ही है. उसे हमारी हालत का पता है, वह हमारे मन की दशा से परिचित है, वह स्वयं तो मन, बुद्धि से परे है पर उससे कुछ छिपा नहीं है. वह अकर्ता भी है और कर्ता भी, वह सब कुछ है और कुछ भी नहीं. वह बुद्धि की समझ में आने वाला नहीं है, वह अद्भुत है लेकिन प्रेम की भाषा वह पढ़ लेता है. हम जिस क्षण उसके साथ होते हैं प्रेम का अनुभव करते हैं अथवा जिस क्षण प्रेम में होते हैं हम उसी के साथ होते हैं. वह ही एक मात्र जानने योग्य है, उसी को अनुभव करना है. सारी साधना का हेतु वही है, वह आनंद है, रस है, ज्ञान है, शांति है, प्रेम है और शक्ति भी वही है. इस सारे विश्व को उसने एक शक्ति से जोड़ा है, वही वह है. 

Monday, May 14, 2012

जिन्ह हरि कथा सुनी नहीं काना


जिन्ह हरि कथा सुनी नहीं काना, श्रवण रन्ध्र अहि भवन समाना” हरि कथा हृदय को शीतलता प्रदान करती है, तीनों तापों से मुक्त करती है. अंतर्मन को शुद्ध और पावन करती है. उच्च विचारों का प्रवाह हमारे भीतर होने लगता है. अपने से मिलाती है, एक बार बोध होने पर उसमें कैसे टिके रहें वह उपाय बताती है. शाश्वत और नश्वर का भेद पता चलता है. समय का सही उपयोग कैसे हो इसका ज्ञान होता है. हम संसार का ज्ञान प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं, पर कितना भी जान लें वह अधूरा ही रहता है, संसार बनाने वाले का ज्ञान ही हमें पूर्ण कर सकता है. जिससे सब कुछ जाना जाता है, जिससे सब कुछ हुआ है, जो सत्य है, शिव है, सुंदर है, जो आनंद है. जिसका चिंतन हमें मुक्त करता है. मुक्ति ही आनंद है, बंधन ही दुःख है. विकारों की रस्सियों से बंधे मन को हमें स्वयं ही खोलना है, और मन ने स्वयं ही यह बंधन बांधा हुआ है, वही स्वयं को मुक्त कर सकता है, पर यह समझ सत्संग देता है, हरि कथा देती है.