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Monday, October 9, 2017

अपने घर बैठा पर भूला

६ अक्तूबर २०१७  
कबीर कहते हैं, हरि का घर खाला का घर नहीं है, उनका अर्थ यह नहीं है कि उसके घर जाना कठिन है बल्कि यह कि वह तो अपना ही घर है, खाला के घर भी जाना हो तो कुछ देर लगेगी. पर यहाँ तो अपने ही घर में बैठे हैं, बस नेत्र बंद हैं. सपना देख रहे हैं कि संसार में हैं. जीवन एक संघर्ष है ऐसा मान लिया है तो संघर्ष की तैयारी में लगे हैं. संत कहते हैं सत्य के प्रति जागना ही उससे मिलन का एक मात्र उपाय है                                                                                                                                                                                                                              

Sunday, July 13, 2014

हरि भजन कर ले मना

सितम्बर २००६ 
भजन वही है जो हमें शब्द से निःशब्द की ओर ले जाता है, क्रिया से क्रियाहीनता की तरफ ले जाता है, विचार से निर्विचार की तरफ ले जाता है. शब्द, विचार और क्रिया हमें संतप्त करते हैं, और संतृप्त करते हैं आनद व अश्रु जो इनके विपरीत से मिलते हैं. कर्मयोग का एक सिद्धांत है, कर्म तभी पूर्ण होता है जब हम उससे जो अपेक्षित हो वही चाहते हैं, वह अपेक्षित क्या है, वह है आनंद, उसके बिना हमारे कर्म अधूरे ही रहते हैं. हमारा हृदय आनन्द से भर गया है इसका प्रमाण है कि भीतर निर्भयता, निश्चिंतता और निर्मलता बढ़ गयी है. अनावश्यक चेष्टा न हो, वाणी से व्यर्थ काम न हो तथा मन सदा उसके स्मरण में रहे तो सच्चा भजन है.


Monday, May 14, 2012

जिन्ह हरि कथा सुनी नहीं काना


जिन्ह हरि कथा सुनी नहीं काना, श्रवण रन्ध्र अहि भवन समाना” हरि कथा हृदय को शीतलता प्रदान करती है, तीनों तापों से मुक्त करती है. अंतर्मन को शुद्ध और पावन करती है. उच्च विचारों का प्रवाह हमारे भीतर होने लगता है. अपने से मिलाती है, एक बार बोध होने पर उसमें कैसे टिके रहें वह उपाय बताती है. शाश्वत और नश्वर का भेद पता चलता है. समय का सही उपयोग कैसे हो इसका ज्ञान होता है. हम संसार का ज्ञान प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं, पर कितना भी जान लें वह अधूरा ही रहता है, संसार बनाने वाले का ज्ञान ही हमें पूर्ण कर सकता है. जिससे सब कुछ जाना जाता है, जिससे सब कुछ हुआ है, जो सत्य है, शिव है, सुंदर है, जो आनंद है. जिसका चिंतन हमें मुक्त करता है. मुक्ति ही आनंद है, बंधन ही दुःख है. विकारों की रस्सियों से बंधे मन को हमें स्वयं ही खोलना है, और मन ने स्वयं ही यह बंधन बांधा हुआ है, वही स्वयं को मुक्त कर सकता है, पर यह समझ सत्संग देता है, हरि कथा देती है. 

Wednesday, May 2, 2012

जो तू है सो मैं हूँ


फरवरी २००३ 
सच्चिदानंद का अर्थ है जो सत् है, चित् है और आनंद स्वरूप है. सत् का अर्थ है- ‘जो है’ और चित् का अर्थ है- ‘जिसे इसका ज्ञान है’ तथा जो आनंद स्वरूप हैं. सो हम भी सच्चिदानंद हुए, जिसे सोहम् कहकर भी व्यक्त करते हैं. भक्ति में पहला कदम तो ‘तू ही है’ से शुरू होता है, यह जगत भी उसी का रूप है, और ‘मैं’ भी जगत का अंश है सो ‘मैं’ भी उसी का रूप हुआ. जब तक यह बात अनुभव से न जान ली जाये तब तक बुद्धि से तो स्वीकारी जा सकती है. मौन रहकर ही वह अनुभव हो सकता है, सत्य को बोलकर व्यक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसी क्षण बोलने वाला पृथक हो जाता है. “प्रेम गली अति सांकरी जामे दो न समाहीं, जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं”