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Monday, October 9, 2017

अपने घर बैठा पर भूला

६ अक्तूबर २०१७  
कबीर कहते हैं, हरि का घर खाला का घर नहीं है, उनका अर्थ यह नहीं है कि उसके घर जाना कठिन है बल्कि यह कि वह तो अपना ही घर है, खाला के घर भी जाना हो तो कुछ देर लगेगी. पर यहाँ तो अपने ही घर में बैठे हैं, बस नेत्र बंद हैं. सपना देख रहे हैं कि संसार में हैं. जीवन एक संघर्ष है ऐसा मान लिया है तो संघर्ष की तैयारी में लगे हैं. संत कहते हैं सत्य के प्रति जागना ही उससे मिलन का एक मात्र उपाय है                                                                                                                                                                                                                              

Wednesday, April 10, 2013

कहत कबीर सुनो भई साधो


जुलाई २००४ 
कबीर कहते हैं, गहरी नदिया, नाव पुरानी, खेवटिया से मिले रहना.....कुछ लेना न देना मगन रहना...
संसार की नदी गहरी है..तन की नाव जर्जर हो रही है..भीतर वाले से मिलकर जो नहीं रहेगा वह तो डूबेगा ही. नित्य से मिले रहना है, अनित्य तो वैसे भी छूटने ही वाला है. असत्य टिकने वाला नहीं  है, सत्य का आश्रय लेने में ही हमारी जीत है, तब हमें किसी के अधीन नहीं रहना होगा, हर क्षण एक स्वतंत्रता का भास होगा. हम तब तक सम्पूर्ण रूप से आनन्दित नहीं रह सकते, जब तक हमारे भीतर तृष्णा की छोटी सी भी चिंगारी जलती रहेगी. जब अहंता, ममता नहीं रहती तब भीतर अखंड शांति आ विराजती है. 

Wednesday, August 17, 2011

साधना और श्रद्धा


सितम्बर २००१ 

साधक जब अभ्यास में गहरे उतरता है, उसे कई अनुभव होने लगते हैं, और सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है. अनंत सुख हमारे भीतर है कबीर ने कहा है “ मोहे सुन सुन आवे हांसी, पानी विच मीन पियासी” मनुष्य के पास श्रद्धा, ज्ञान और उस परम से जुड़ने की कला है. अव्यक्त को व्यक्त करने की सामर्थ्य मानव में ही है. श्रद्धा के बिना वह यंत्र के समान हो जाता है, श्रद्धा के साथ साथ उत्साही व संयमी होने से ज्ञान का अधिकारी शीघ्र ही हुआ जा सकता है. धर्म का तत्व तर्क-वितर्क करके नहीं दिया जा सकता, वह तो हृदय से ही अनुभव किया जा सकता है.