नारद भक्ति सूत्र की व्याख्या करते हुए गुरु जी आगे कहते हैं, तीन गुणों से यह जगत बना है. प्रेम की अभिव्यक्ति भी इन्हीं गुणों से होती है. तमोगुणी प्रेम में पीड़ा देते हैं और पीड़ा लेते हैं. रजोगुणी प्रेम किसी न किसी कारण से होता है, गुणों के आधार पर या किसी योग्यता के आधार पर होता है, यह प्रेम स्वार्थी होता है. भगवान के मंदिर में लोग किसी न किसी कामना से जाते हैं. सतोगुणी प्रेम बिना किसी कारण के होता है. भजन का अर्थ होता है भागीदारी, ईश्वर के गुणों को ग्रहण करना तथा अपने सुख-दुःख को भगवान के साथ बाँट लेना. परमात्मा और समष्टि के प्रति जब किसी का प्रेम भाव अकारण बहने लगता है तो वही प्रेम भक्ति बन जाता है. इसकी तुलना केवल माँ के प्रेम से की जा सकती है, माँ का प्रेम सन्तान के प्रति बहता रहता है, बना रहता है, कभी मिटता नहीं है. सारे जगत के प्रति जब ऐसी दृष्टि जगती है, वही भक्ति है. नारद मुनि कहते हैं, भावनात्मक या गुणात्मक प्रेम के परे जाकर स्वामी-सेवक भाव से या प्रेयसी-प्रियतम भाव से प्रेम जगे, यही भक्त का प्रयास रहे. ऐसा प्रेम हरेक के भीतर है बस छिप गया है. अपने सम्पूर्ण अस्तित्त्व से इस प्रेम को अभिव्यक्त करना है.
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Tuesday, June 16, 2020
Sunday, July 13, 2014
हरि भजन कर ले मना
सितम्बर २००६
भजन वही है जो हमें शब्द
से निःशब्द की ओर ले जाता है, क्रिया से क्रियाहीनता की तरफ ले जाता है, विचार से
निर्विचार की तरफ ले जाता है. शब्द, विचार और क्रिया हमें संतप्त करते हैं, और
संतृप्त करते हैं आनद व अश्रु जो इनके विपरीत से मिलते हैं. कर्मयोग का एक
सिद्धांत है, कर्म तभी पूर्ण होता है जब हम उससे जो अपेक्षित हो वही चाहते हैं, वह
अपेक्षित क्या है, वह है आनंद, उसके बिना हमारे कर्म अधूरे ही रहते हैं. हमारा हृदय
आनन्द से भर गया है इसका प्रमाण है कि भीतर निर्भयता, निश्चिंतता और निर्मलता बढ़
गयी है. अनावश्यक चेष्टा न हो, वाणी से व्यर्थ काम न हो तथा मन सदा उसके स्मरण में
रहे तो सच्चा भजन है.
Thursday, March 13, 2014
मधुर अति है सन्त की बानी
अक्तूबर २००५
भोजन
के समय, भजन के समय, प्रातः काल उठते समय, रात को सोते समय तथा घर से निकलते समय
कभी क्रोध नहीं करना चाहिए. आज ये बातें सन्त मुख से सुनीं. सारे भेद भावों से ऊपर
उठे हुए सद्गुरु की यही तो निशानी है, उसकी नजर आत्मा पर होती है, वह एक को ही
देखता है, भेद-भाव तो हम करते हैं. हमारी दृष्टि भी यदि गुण ग्राहक हो जाये तो एक
ही क्षण भी न लगे हमें तरने में. ऊपरी भेद तो मिथ्या हैं, सभी के भीतर एक ही
परमात्मा आसीन है, हमें उसी पर दृष्टि रखनी है. अपने भीतर भी उसी शुद्ध चेतना के
दर्शन करने हैं.
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