भगवद कथा
हमें अपने स्वरूप में स्थित करने के लिए उपचार है. हमने जो अपने आप को बंधन में
पड़ा हुआ मान लिया है, उससे छुड़ाने के लिए औषधि है. हरि ने अपने को अति सुलभ बना कर
छिपा लिया है, उस हरि का परिचय कराने कथा आती है. हम जब पाठ करते हैं तो कई अर्थ छिपे
रह जाते हैं, किसी सन्त द्वारा कही गयी कथा का श्रवण करने से भीतर जागृति होती है,
अहं पिघल कर बह जाता है, सभी कुछ भीग जाता है, हृदय द्रवित हो जाता है. वह हरि
प्रेमस्वरूप है, उसके प्रेम की आंच हमारे अंतर को गला देती है, किन्तु भीतर एक
शीतलता का अहसास होता है. यदि ऐसा न हो तो हमारा सुनना व्यर्थ ही है. उसे हमारी
हालत का पता है, वह हमारे मन की दशा से परिचित है, वह स्वयं तो मन, बुद्धि से परे
है पर उससे कुछ छिपा नहीं है. वह अकर्ता भी है और कर्ता भी, वह सब कुछ है और कुछ
भी नहीं. वह बुद्धि की समझ में आने वाला नहीं है, वह अद्भुत है लेकिन प्रेम की
भाषा वह पढ़ लेता है. हम जिस क्षण उसके साथ होते हैं प्रेम का अनुभव करते हैं अथवा
जिस क्षण प्रेम में होते हैं हम उसी के साथ होते हैं. वह ही एक मात्र जानने योग्य
है, उसी को अनुभव करना है. सारी साधना का हेतु वही है, वह आनंद है, रस है, ज्ञान
है, शांति है, प्रेम है और शक्ति भी वही है. इस सारे विश्व को उसने एक शक्ति से
जोड़ा है, वही वह है.
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Tuesday, January 7, 2014
Thursday, February 2, 2012
ध्यान की महिमा
हम ईमानदार क्यों नहीं रहते, अन्यों के साथ व अपने साथ भी. अपनी कमियों को छिपाना चाहते हैं. दूसरों की दृष्टि में नेक बनने की चाह हमें सच्चा होने से रोकती है. गुणवान होना व गुणवान दिखना दोनों ही सूक्ष्म वासनाएं ही तो हैं. हम अपने सहज स्वरूप में स्थित रहें तो बहुत सारी परेशानियों से बच जाते हैं. आत्म राज्य के अधिकारी होने की पहली शर्त यही है कि हम अपने सहज रूप में रहें. ईश्वर व हमारे बीच जो पर्दे हैं उनमें अहं सबसे प्रमुख है, यही हमें दूसरों की दृष्टि में बेहतर बनने को प्रेरित करता है और हम अपने पथ से भटक जाते हैं. नियमित ध्यान करने से सब कुछ अपने आप होने लगता है, तब हमें अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता. हृदय के सारे कलुष मिटने लगते हैं, अहं से मुक्ति मिलने लगती है, हमें अपने मूल स्वरूप की झलक मिलती है. सात्विक अभिमान जगता है कि हम स्वयं आनंद स्वरूप हैं, तब जगत से कुछ पाना शेष नहीं रहता. हम आत्मनिर्भर हो जाते हैं, तब हमारे व परम के बीच पर्दे हटने लगते हैं. इस तरह पहले मन को फिर वाणी को फिर कर्मों को हम शुद्ध करते जाते है, हम से ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे किसी अन्य का अहित हो, सजग रहते हुए अपने समय का सदपुयोग करते हुए हम मुक्ति का जीवन जीते हैं.
Monday, December 12, 2011
गुरुद्वार
अगस्त २००२
सदगुरु वास्तव में उसे ही मिलते हैं, जिसका हृदय उनकी कद्र जानता है. वास्तव में वह क्या हैं?, कौन हैं? कोई नहीं जानता. उनकी कृपा का एक अंश ही मिल जाये तो साधक का मार्ग प्रशस्त हो जाता है. लेकिन उसे पाने के लिये अहं को पूरी तरह नष्ट करना होगा. गुरु द्वार पर अकिंचन बन कर ही जाना होगा. उन्हें अहं तोड़ना आता है और जब वह ऐसा करें तो वहाँ से भाग आने के सिवा कुछ और भी करना सीखना होगा. अहं और ममता के दो ताले हैं जिन्हें खोले बिना हम ईश्वर तक नहीं पहुँच सकते. पर जहाँ प्रेम होता है वह तत्क्षण जवाब देते हैं. हृदय के सच्चे प्रेम को वह अस्वीकार नहीं कर पाते और धीरे-धीरे साधक के हृदय से अहंकार व ममता नष्ट होने लगते हैं.
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