Showing posts with label भाषा. Show all posts
Showing posts with label भाषा. Show all posts

Friday, September 14, 2018

हिंदी दिवस पर शुभकामनायें


 १४ सितम्बर २०१८ 
आज हिंदी दिवस है. हिंदी एक सरल, सहज और मधुर भाषा है. यह आसानी से समझी और बोली जाती है. बोलचाल की हिंदी सीखने में अहिन्दी भाषियों को ज्यादा समय नहीं लगता. यहाँ असम में जहाँ हम रहते हैं, लगभग हर प्रान्त के लोग रहते हैं. पंजाबी, तमिल, तेलुगु, मराठी, बंगाली, मलयालम और असमिया भाषा-भाषी लोग हिंदी को ही सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयोग में लाते हैं. हर तबके के लोग हिंदी समझ लेते हैं और बोलने का प्रयास करते हैं. यह सही है कि राजकाज की भाषा के रूप में हिंदी का समुचित विकास नहीं हो रहा है और न ही निकट भविष्य में ऐसा होने की आशा है. हिंदी को अपने बलबूते पर ही आगे बढ़ना होगा. जन-जन में लोकप्रिय होने होने के कारण हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है.

Monday, July 9, 2018

सृजनशील जब मन हो जाये


९ जुलाई २०१८ 
जीवन ऊर्जा हर क्षण बंट रही है. कहीं नक्षत्रों का निर्माण हो रहा है तो कहीं पुष्पों का सृजन. इस धरती पर हर क्षण कितना कुछ नया बन रह है और पुराना विनष्ट हो रहा है. मानव मन में भी असंख्य विचारों का सृजन होता है, विशाल पुस्तकालय उन विचारों की ही देन हैं. जाने-अनजाने हम सभी सृष्टिकर्ता के इस कार्य में उसके सहायक बन जाते हैं. उसने मानव को ही नित नूतन सृजन की क्षमता दी है. मन की गहराई में न जाने कहाँ से किसी कवि और लेखक के भीतर भावनाओं और विचारों का जखीरा चला आता है, जिसे वह रचना के रूप में बाहर उलीच देता है. भाषा और व्याकरण का सीमित ज्ञान ही इसका कारण है ऐसा नहीं लगता, अवश्य ही उसका मन किसी अनंत स्रोत से जुड़ा है, जो ताजे कूप की तरह सदा भरा रहता है. कभी ऐसा भी देखा गया है जिस भाषा का इस जन्म में अध्ययन ही नहीं किया, किन्हीं पलों में उसके शब्द भी भीतर से फूटने लगते हैं. तब विश्वास हो जाता है, यह यात्रा सिर्फ इसी जन्म की तो नहीं है.

Thursday, September 14, 2017

जन-जन की भाषा है हिंदी

१४ सितम्बर २०१७ 
आज हिंदी दिवस है. ‘हिंदी’ एक ऐसी भाषा जिसने पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया हुआ है. जो अनेकता में एकता का जीता-जागता उदाहरण है. बारहवीं शतब्दी से हिंदी की धारा भारत में जन-जन के हृदयों को आप्लावित कर रही है. मध्य काल में सूर, तुलसी हों या कबीर और रहीम, हिंदी की ध्वजा सदा ही लहराती रही है. आधुनिक काल में भी हिंदी के विद्वानों की एक लम्बी श्रंखला चलती आ रही है, जिसने जन मानस के हृदयों को हिंदी-सुधा से पोषित किया है. आज सामान्य जन की बोलचाल भाषा हो या साहित्य की भाषा दोनों ही क्षेत्रों में हिंदी फल-फूल रही है, कमी है तो बस इसकी कि आजादी के सत्तर वर्षों के बाद भी इसे राजकाज की भाषा नहीं बनाया जा सका. अनुवादित व क्लिष्ट भाषा के सहारे इस कार्य को नहीं किया जा सकता. मौलिक रूप से हिंदी में ही सरल भाषा में किया गया कार्य ही सरकारी कार्यालयों में अपनाना होगा वरना वहाँ यह केवल हिंदी दिवस तक ही सिमट कर रह जाएगी.