फरवरी २००५
जगत के साथ जो हमारा व्यवहार है, वह
प्रतिबिम्ब है हमारे भीतर के जगत का, लोगों के साथ हमारा सबंध दर्पण के समान है.
दूसरों में जो कमियां हमें दिखाई देती है, वास्तव में वे हमारे भीतर होती है, और
हम उन्हें निकालना चाहते हैं, पर यदि हम बाहर को ही देखते रहे और यह न देखा कि
हमारे व्यवहार का संचालन कौन कर रहा है तो हम स्वयं को नहीं बदल पाएंगे. हमारा
आचरण भले ही उसके विपरीत हो पर भीतर का भाव वही रहेगा. ध्यान के समय हम उस गहराई
तक पहुंच सकते हैं, और स्वयं को सुझाव देकर परिवर्तन ला सकते हैं. हम अपने पूर्व
जीवन को यदि मुडकर देखें तो पाते हैं, मन के अधीन रहकर सदा दुःख ही जाना है, मन की
गहराई में समाधान मिलता है, इसी समाधान का अनुभव ही सच्ची आध्यत्मिकता है. प्रभु
की शरण में जाकर हम इसे पा सकते हैं.