“शरीरं दृश्यम” जिस
तरह प्रकृति दृश्य है उसी तरह देह तथा मन भी साधक के लिए दृश्य हो जाता है. शरीर,
मन, विचारों तथा भावनाओं से परे वह भीतर साक्षी रूप का अनुभव करता है अथवा तो यह
सारा दृश्य ही हमारा शरीर है, हम सर्व व्यापक हैं, हवा, पानी और धूप हमारे ही अंग
हैं. सीमित होते हुए भी हम असीमित हैं. भीतर का वायु तत्व बाहर के वायु तत्व से जुड़ा
है. पृथ्वी तत्व अभी पैरों के नीचे है, मृत्यु के बाद ऊपर हो जायेगा. जब यह भाव
जगता है तो कोई भी भेद नहीं रहता, अभेद में ही प्रेम है. पहले उपाय से सबसे पृथक
होकर जो बचता है वह प्रेम है और दूसरे अर्थ में सबसे जुडकर जो मिलता है वह प्रेम
है. यह इतनी पवित्र, सूक्ष्म, और अद्भुत अनुभूति है कि शब्दों की पकड़ में नहीं आती
!
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Saturday, February 22, 2014
Thursday, July 7, 2011
प्रेम और मोह
अगस्त २०००
प्रेम एक व्यापक तत्व है, समुन्दर की तरह विशाल और आकाश की तरह निस्सीम ! जहाँ भी, जिसके भी हृदय में प्रेम होगा वह सबके लिये, प्राणी मात्र के लिये होगा. मोह एक संकीर्ण धारा की तरह है. मोह बंधन में डालता है जबकि प्रेम मुक्त करता है. नीला आकाश हमारी आत्मा का मूल स्वभाव है, स्वच्छ, निर्मल, मुक्त और असीम. विचारों के बादल उसे आच्छादित कर भी लें तो भी हमें उसकी स्मृति को बनाये रखना है प्रतिक्षण, प्रतिपल ! हमारा मन जो चारों दिशाओं में बिखरा-बिखरा सा रहता है उसे एकत्र करना है, एक रूप देना है. यह संसार जैसा हमें दिखाई देता है वास्तव में वैसा है नहीं. पल-पल बदलते इस संसार को बस साक्षी भाव से देखते जाना है. प्रतिक्रिया ही दुःख का कारण है, देर-सबेर सत्य अपने-आप ही सम्मुख आ जाता है, सत्य की स्थापना नहीं करनी पड़ती वह तो स्वयंभू है.
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