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Wednesday, June 17, 2020

जाना है उस पार जिसे


भक्ति की व्याख्या कहते हुए आगे गुरूजी कहते हैं, हनुमानजी भक्तों में शिरोमणि हैं. हनुमान के भीतर रोम-रोम में राम ही बसे हैं. किसी -किसी क्षण में भक्त भगवान से भी बड़ा हो जाता है. राम से ज्यादा शक्ति हनुमान में है. भगवान भक्त को उससे ज्यादा समझते हैं, वह उसकी दुर्बलता और ताकत दोनों को जानते हैं. हनुमान जब स्वयं की शक्ति को भूल गए थे तब जाम्बवान के द्वारा ईश्वर ने ही सम्भवतः उन्हें उसकी याद दिलाई. भक्त कभी अकेलापन महसूस नहीं करता. उसके आराध्य की एक नजर से उसके कर्म नष्ट होने लगते हैं. गुरु के सम्मुख भी यही होता है. उनकी शाब्दिक शक्ति से अधिक होती है उनकी उपस्थिति. जिसके भीतर ज्ञान और भक्ति का संगम हुआ है, वहीं अमृत प्रकटता है. गुरु के प्रति श्रद्धा हो तो उनकी बात पर भरोसा करना आसान है. अल्प बुद्धि में फंसा व्यक्ति शीघ्र भरोसा नहीं कर पाता। जो बुद्धत्व को प्राप्त करता है उसकी बुद्धि प्रकांड होती है, किन्तु वह बुद्धि के पार चले जाते हैं. जिस नाव में बैठकर नदी पार की, उसे तट पर जाकर तो छोड़ना पड़ेगा. भक्ति के क्षेत्र में तर्क का कोई स्थान नहीं है. तर्क कब कुतर्क बन जाता है पता ही नहीं चलता. वितर्क से आत्मज्ञान होता है .हर अनुभूति तर्क से परे है. मन्त्र शक्ति भी अतार्किक है, कृपा भी अतार्किक है.

Thursday, June 25, 2015

योग लगाना है उससे

मई २०१० 
आत्मज्ञान हुए बिना मुक्ति सम्भव नहीं है. आत्मा के सात गुण हैं शांति, आनंद, सुख, प्रेम, ज्ञान, पवित्रता और शक्ति ! जिनकी कमी से जीवन अधूरा ही नहीं रहता बल्कि उसमें पीड़ा भर जाती है. शांति यदि न हो तो नर्वस सिस्टम रोगी हो जाता है, आनंद न हो तो अंतर्स्रावी ग्रन्थियां अपना काम ठीक से नहीं करतीं. सुख न हो तो भोजन नहीं पचता, प्रेम न हो तो ह्रदय रोग होने का खतरा है, पवित्रता न हो तो कर्मेन्द्रियाँ रोगी हो जाती हैं तथा शक्ति न हो तो संकल्प दृढ नहीं हो पाते. हमारी शारीरिक व मानसिक बीमारियों का इलाज योग के पास है. योग होते ही आत्मा के द्वार खुल जाते हैं और जीवन में विस्मय हो तो योग घटित होता है.