Sunday, July 12, 2020

निज स्वरूप को जाना जिसने

अविद्या का आवरण हमारे स्वरूप को हमें देखने नहीं देता. देह, मन, बुद्धि को ‘मैं’ मानना ही अविद्या है. हम स्वयं को जैसा मानेंगे वैसा ही अपना स्वरूप हमें प्रतीत होगा. यदि हम देह को ही मैं मानते हैं तो सदा ही भयभीत रहेंगे, क्योंकि देह निरन्तर बदल रही है और एक दिन मिट जाएगी. यदि मन को अपना स्वरूप मानते हैं तो सदा ही कम्पित होते रहेंगे क्योंकि मन भी इस निरंतर बदलते हुए संसार से ही बना है, जैसा वातावरण, जैसे शिक्षा उसे मिलती है वह उसी को सत्य मानकर उसी के अनुसार चलता है. जब हम बुद्धि को ही अपना स्वरूप मानेंगे तो सदा ही मान-अपमान के द्वंद्व में फंसे रहेंगे क्योंकि अपनी बुद्धि से उपजे विचार, धारणा आदि को ही हम सत्य मानेंगे और दूसरों के विचारों से मतभेद पग-पग पर होता ही रहेगा. इसके साथ-साथ ही देह, मन और बुद्धि से किये गए कार्यों का हमें अभिमान भी बना रहेगा. 

6 comments:

  1. नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 14 जुलाई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!


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    1. बहुत बहुत आभार !

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  2. आदरणीया मैम,
    बहुत सरल शब्दों में गीता का सार कह दिया आपने। पढ़ कर प्रेरणा मिली और आनंद आया और नानी से सुना कृष्ण अर्जुन संवाद सजीव हो उठा।
    मैं एक छात्रा हूँ। अभी कुछ ही दिनों पहले हिंदी कविताओं का ब्लॉग शुरू किया। क्या आप मेरे ब्लोग पर जा कर मेरी रचनाएँ पढ़ने के अनुग्रह करेंगी। मैं आभारी रहूँगी। में अपने ब्लॉग का लिंक यहाँ नही दे या रही हूँ पर यदु आप मेरे नाम पर क्लिक करें तो वो आपको मेरे प्रोफाइल तक ले जायेगा।। वहाँ मेरे ब्लॉग के नाम काव्यतरंगिनी पर क्लिक करियेगा, वह आपको मेरे ब्लॉग तक ले जाएगा।
    धन्यवाद।

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    1. स्वागत है अनंता जी, आपके नाम के अनुरूप ही है आपकी विचारधारा, शुभकामनायें !

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