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Wednesday, May 8, 2024

एक तलाश सदा जारी है

हर आत्मा प्रेम से उपजी है, प्रेम ने उसे सींचा है और प्रेम ही उसकी तलाश है. माता-पिता शिशु की देह को जन्म देते हैं, आत्मा उसे अपना घर बनाती है. शिशु और परिवार के मध्य प्रेम का आदान-प्रदान उस क्षण से पहले से ही होने लगता है जब बालक बोलना आरम्भ करता है. अभी उसमें अहंकार का जन्म नहीं हुआ है, राग-द्वेष से वह मुक्त है, सहज ही प्रेम उसके अस्तित्त्व से प्रवाहित होता है. बड़े होने के बाद जब प्रेम का स्रोत विचारों, मान्यताओं, धारणाओं के पीछे दब जाता है, तब प्रेम जताने के लिये शब्दों की आवश्यकता पडती है. जब स्वयं को ही स्वयं का प्रेम नहीं मिलता तो दूसरों से प्रेम की मांग की जाती है. दुनिया तो लेन-देन पर चलती है इसलिए पहले प्रेम को दूसरे तक पहुँचाने का आयोजन किया जाता है. यह सब सोचा-समझा हुआ नहीं होता, अनजाने में ही होता चला जाता है. प्रेम पत्रों में कवियों और लेखकों के शब्दों का सहारा लिया जाता है. दूसरे के पास भी तो प्रेम का स्रोत भीतर छिपा है, उसे भी तलाश है. जीवन तब एक पहेली बन जाता है. 

Sunday, February 3, 2019

स्मृति लब्ध्वा...याद रहे जब पल पल उसकी


४ फरवरी २०१९ 
जो हमें मिला हुआ है पर उस तक जाने का मार्ग हम भूल गये हैं वही हमारा परम लक्ष्य है. जैसे कोई अपनी बहुमूल्य वस्तु कहीं रख दे और भूल जाये. वह वस्तु उसकी ही थी, उसे मिली ही हुई थी पर उसकी स्मृति नहीं रह गयी तो न मिले के बराबर हो गयी, और भीतर एक बेचैनी भी भर जाती है, उसकी तलाश जारी रहती है. इसी तरह आत्मा जो परमात्मा से मिली ही हुई है, जब उसे खो देती है तो एक बेचैनी सी भीतर छायी रहती है. मानव की सारी तलाश उसी अखंड आनन्द को, उसी एकरस सुख को पाने की ही तो है जो उसे अपने इर्द-गिर्द सुख-सुविधा के अम्बार लगाने को प्रेरित करती है. यह अलग बात है कि धन के अम्बार भी उसे वह सुख नहीं दे पाते क्योंकि वह सुख उसे मिला ही हुआ है मात्र उसकी याद ही खो गयी है.

Tuesday, March 21, 2017

होना भर ही जब आ जाये

२२ मार्च २०१७ 
हम स्वयं को उस क्षण सीमित कर  लेते हैं जब केवल उपाधियों को ही अपना होना मान लेते हैं.  आज हर कोई अपनी पहचान बनाने में लगा है, वह जगत के सामने स्वयं को कुछ साबित कर के अपनी पहचान बनाना चाहता है, मानव यह भूल जाता है यह पहचान उसे अपने वास्तविक स्वरूप से बहुत दूर ले जाती है. कोई अध्यापक तभी तक अध्यापक है जब तक वह कक्षा में पढ़ा रहा है, कोई वकील तभी तक वकील है, जब वह मुकदमा लड़ रहा है, किन्तु उसके अतिरिक्त समय में वह कौन है, हम कितनी भी उपाधियाँ एकत्र कर लें, भीतर एक खालीपन रह ही जाता है . बाहर की उपाधियाँ चाहे हमें  बौद्धिक व भावनात्मक सुरक्षा भी दे दें, किन्तु उसके बाद भी हमारी तलाश खत्म नहीं होती जब तक हमें अपनी अस्तित्त्वगत पहचान नहीं होती. जब हम स्वयं को मात्र होने में ही स्वीकार कर लेते हैं, उस क्षण भीतर एक सहजता का जन्म होता है, अब सारा जगत अपना घर लगने लगता है.

Wednesday, January 4, 2017

एक तलाश परम पद की

४ जनवरी २०१७ 
 हम सब सफल होना चाहते हैं. सबसे आगे भी रहना चाहते हैं. मानव  स्वभाव में ही यह गुंथा हुआ है कि वह थोड़े से संतुष्ट नहीं होता. सब कुछ पाकर भी उसे ऐसा लगता है कि कुछ अधूरा सा है. ऐसे में क्या जरूरी नहीं है कि हम थोड़ी देर थमकर गहराई से इसका कारण सोचें. जब हमसे काफी आगे वाला भी संतुष्ट नहीं है तो  वहाँ पहुच कर क्या हम संतुष्ट हो जायेंगे. इसका उत्तर भीतर से ही मिलेगा. संत कहते हैं हमारी तलाश तब तक जारी रहेगी जब तक हम उस पद को नहीं पा लेते जहाँ पूर्ण संतुष्टि है. वह पद अनंत है जिस पर हर कोई हर वक्त बैठ सकता है, उस की अभीप्सा हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. किन्तु हम उस मार्ग को नहीं जानते जिससे वहाँ जाया जा सकता है. ध्यान ही वह मार्ग है, इस मार्ग पर चलने वाला यात्री किसी से आगे जाना नहीं चाहता वह अपनी यात्रा भीतर ही भीतर करता है और उस तक पहुँच जाता है. 

Monday, June 10, 2013

गंगा बहती ही जाती है

अक्तूबर २००४ 
कभी-कभी ऐसा लगता है, कितना समय यूँ ही बीता जा रहा है, हम वहीं के वहीं खड़े हैं, सांसें व्यर्थ जा रही है, जिसकी तलाश में हम निकले थे वह अब भी दूर ही है, शायद यह तलाश कभी खत्म होती भी नहीं, हिमालय से निकल कर गंगा नदी समुद्र से मिलने के लिए जो रास्ता तय करती है वह कभी नहीं कर पाती, निरंतर बहती ही रहती है. यदि सारी की सारी नदी एक ही बार में सागर में मिल जाये तो नदी का प्रवाह ही रुक जाये. ऐसा ही हमारा जीवन है, सदा आगे बढ़ने का नाम ही जीवन है, हम कुछ भी करें, सोना, जागना, खाना, पीना, सोचना, लिखना, पढना सभी कुछ उसी एक की खोज में सहायक ही है. हमारी यात्रा बाहर से भीतर की ओर है, जीवन भर अपने साथ रहते हुए भी हम स्वयं को नहीं जान पाते, हमारी खोज का केंद्र यद्यपि भीतर ही है, पर विचार, भावनायें, विकार, अहंकार और क्रोध की परतें उसे हमसे दूर किये रहते हैं. हमारा मिथ्या व्यक्तित्व उस सच्चे निर्दोष, सहज स्वरूप को ढके रहता है, हम उस निष्पाप सहज स्वरूप को बाहर लाने से डरते हैं, हम जगत के व्यवहार से परिचित हो चुके हैं, उसका असर हम पर तभी तक पड़ता है जब तक सत्य का पता नहीं चलता, एक बार मन का दर्पण स्वच्छ हो जाने पर सारी जिम्मेदारी हमारी है, हम यदि चाहें तो सत्य का साथ दें और चाहें तो यूँ ही माया जाल में फंसे रहें.

Sunday, September 23, 2012

घर जाना है सबको इक दिन


अगस्त २००३ 
अपने मन की वृत्ति को भीतर की ओर ले जाना है, उस स्रोत से जोड़ना है जहां से उसका जन्म हुआ है. हमें घर वापस लौटना है. मनोवृत्ति जब तक बाहर भटकती है तो अशांत होगी और भीतर अपने मूल स्वरूप से मिलेगी तो सुख पायेगी. जब से मानव होश सम्भालता है एक दौड़ शुरू हो जाती है, लेकिन उसे यह होश नहीं रहता यह दौड़ किसलिए है, कहाँ खत्म होगी, क्यों हम तलाश रहे हैं, किसे तलाश रहे हैं वह यह रुक कर पूछता तक नहीं, बस भेड़चालमें चलता रहता है. घूमता रहता है, गिरता है, चोट खाता है फिर उठकर चल देता है, कहीं कोई अच्छा मंजर दिखाई पड़ता है तो उसमें खो जाता है, लगता है इसे ही पाना था, पर वह क्षणिक सुख समाप्त हो जाता है, पीड़ा की सौगातदे  जाता है, फिर एक नई दौड़, लेकिन हमारा मन जब भीतर लौटता है तो असीम शांति का अनुभव करता है, ऐसा आनंद जो क्षणिक नहीं है, सत् है, वही हम हैं हम प्रेम से उपजे हैं, प्रेम हमारा स्वभाव है, अपने शुद्ध रूप को पाकर वह थम जाता है. अब और भटकाव नहीं, ठहराव आता है जीवन में. यह भीतर जाने की प्रक्रिया सद्गुरु हमें सिखाते हैं. इसके लिए मन को शांत करना है, ध्यानस्थ होना है, तटस्थ भाव से भीतर देखना है.