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Monday, June 10, 2013

गंगा बहती ही जाती है

अक्तूबर २००४ 
कभी-कभी ऐसा लगता है, कितना समय यूँ ही बीता जा रहा है, हम वहीं के वहीं खड़े हैं, सांसें व्यर्थ जा रही है, जिसकी तलाश में हम निकले थे वह अब भी दूर ही है, शायद यह तलाश कभी खत्म होती भी नहीं, हिमालय से निकल कर गंगा नदी समुद्र से मिलने के लिए जो रास्ता तय करती है वह कभी नहीं कर पाती, निरंतर बहती ही रहती है. यदि सारी की सारी नदी एक ही बार में सागर में मिल जाये तो नदी का प्रवाह ही रुक जाये. ऐसा ही हमारा जीवन है, सदा आगे बढ़ने का नाम ही जीवन है, हम कुछ भी करें, सोना, जागना, खाना, पीना, सोचना, लिखना, पढना सभी कुछ उसी एक की खोज में सहायक ही है. हमारी यात्रा बाहर से भीतर की ओर है, जीवन भर अपने साथ रहते हुए भी हम स्वयं को नहीं जान पाते, हमारी खोज का केंद्र यद्यपि भीतर ही है, पर विचार, भावनायें, विकार, अहंकार और क्रोध की परतें उसे हमसे दूर किये रहते हैं. हमारा मिथ्या व्यक्तित्व उस सच्चे निर्दोष, सहज स्वरूप को ढके रहता है, हम उस निष्पाप सहज स्वरूप को बाहर लाने से डरते हैं, हम जगत के व्यवहार से परिचित हो चुके हैं, उसका असर हम पर तभी तक पड़ता है जब तक सत्य का पता नहीं चलता, एक बार मन का दर्पण स्वच्छ हो जाने पर सारी जिम्मेदारी हमारी है, हम यदि चाहें तो सत्य का साथ दें और चाहें तो यूँ ही माया जाल में फंसे रहें.

Wednesday, July 25, 2012

प्रभुता से प्रभु दूर


जून २००३ 
मन जब वर्तमान में नहीं होता तो चिंता आकर घेर लेती है. वर्तमान में अपार शक्ति है, इस क्षण में यदि मन टिक जाये तो मन स्थिर ही नहीं रहता बल्कि निर्दोष हो जाता है. सहज शांति का अनुभव होता है. ‘लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूर’ संभवतः जब हम विनम्र होते हैं तभी वर्तमान में टिक पाते हैं, जैसे ही अहंकार आ जाता है तो मन भूत या भविष्य की उलझनों में फँस जाता है. भगवद् अनुभव से हम वंचित रह जाते हैं. हम ईश्वर की कृपा के लिये लालायित रहते हैं लेकिन एक बार जब कृपा का अनुभव होने लगता है तो उसे भूल जाते हैं. उसकी कृपा का आनंद ही हमें उसकी कृपा से वंचित कर देता है तभी कृष्ण ने गोपियों को अपना वियोग दिया था, ताकि वे उसे भूलें नहीं.
कभी-कभी किसी से कोई काम कराने के लिए हम क्रोध का आश्रय लेते हैं, यदि भीतर प्रेम है और सजग रहकर केवल ऊपर से क्रोध कर रहे हैं तब भी इसका बीज कहीं अंदर है, तभी यह संभव है, क्षणिक क्रोध भी तभी होता है जब भीतर इसका संस्कार हो. संस्कार को जड़ से मिटाए बिना शाश्वत सुख का अनुभव नहीं हो सकता, सजगता ही इसके लिये साधन है.

Tuesday, February 28, 2012

वही मार्ग दिखाता है

जनवरी २००३ 


अन्नमय कोष की गहराई में प्राणमय कोष है. मनोमय शरीर अंतरआत्मा के करीब है, इसके भीतर विज्ञान मय कोष तथा आनन्दमय कोष है. उसके अंत में हम ज्योति स्वरूप हैं, वही हमारी सच्ची पहचान है. जीवन रहते इन पांचों शरीरों को सबल व सुदृढ़ रखते हुए अपने सत्य स्वरूप तक जाना है. अपने-अपने दुर्गों से बाहर निकलना है. हमारे भीतर जो चैतन्य है, वह हर पल बुला ही नहीं रहा है, मार्ग भी वही बताता है. वह हमें नितांत एकांतिक प्रेम करता है, अहैतुक प्रेम. पर उसके प्रेम को रखने के लिये मन के पात्र को शुद्ध करना होगा, अमृत स्वर्ण कुम्भ में ही रखा जाता है. जीवन में संयम, परमार्थ, तथा ध्यान हमें निर्दोष बनाता है, मिथ्या अहंकार से मुक्त करता है. तब उससे दूरी नहीं रह जाती