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Tuesday, June 12, 2018

बालवत् जब जीना सीखें


१३ जून २०१८ 
शिशु जब जन्म लेता है, उस वक्त उसका कोई धर्म, जाति या नाम नहीं होता, समाज और परिवार ही उसे ये उपाधियाँ देते हैं. वह किसी का पुत्र कहाता है, किसी का भाई अथवा बहन, बाद में वह स्वयं किसी का माता या पिता बनता है, ये सब उपाधियाँ भी जगत के द्वारा प्रदान की गयी हैं. इस तरह एक ही आत्मा कितने ही नाम ग्रहण कर लेती है. इसी तरह एक ही परमात्मा जीव और प्रकृति की उपाधि ग्रहण करके इतने नाम और रूप धारण किये हुए है. ध्यान में ही हम अपने आत्म स्वरूप को जान सकते हैं, समाधि में जाने पर कोई परमात्मा के चिन्मात्र स्वरूप का भी अनुभव कर सकता है. जब तक शिशु को जगत का बोध नहीं होता, अहम भावना का जन्म नहीं हुआ होता, वह कितना सहज रहता है, ध्यान और समाधि को प्राप्त मन भी जगत की सारी हलचल के मध्य पूर्ण रूप से सहजता का जीवन जी सकता है. अपने कर्त्तव्य कर्मों का पालन करते हुए, अपने चारों तरफ प्रेम और शांति का वातावरण बना सकता है.

Tuesday, March 21, 2017

होना भर ही जब आ जाये

२२ मार्च २०१७ 
हम स्वयं को उस क्षण सीमित कर  लेते हैं जब केवल उपाधियों को ही अपना होना मान लेते हैं.  आज हर कोई अपनी पहचान बनाने में लगा है, वह जगत के सामने स्वयं को कुछ साबित कर के अपनी पहचान बनाना चाहता है, मानव यह भूल जाता है यह पहचान उसे अपने वास्तविक स्वरूप से बहुत दूर ले जाती है. कोई अध्यापक तभी तक अध्यापक है जब तक वह कक्षा में पढ़ा रहा है, कोई वकील तभी तक वकील है, जब वह मुकदमा लड़ रहा है, किन्तु उसके अतिरिक्त समय में वह कौन है, हम कितनी भी उपाधियाँ एकत्र कर लें, भीतर एक खालीपन रह ही जाता है . बाहर की उपाधियाँ चाहे हमें  बौद्धिक व भावनात्मक सुरक्षा भी दे दें, किन्तु उसके बाद भी हमारी तलाश खत्म नहीं होती जब तक हमें अपनी अस्तित्त्वगत पहचान नहीं होती. जब हम स्वयं को मात्र होने में ही स्वीकार कर लेते हैं, उस क्षण भीतर एक सहजता का जन्म होता है, अब सारा जगत अपना घर लगने लगता है.