Showing posts with label नर्तक. Show all posts
Showing posts with label नर्तक. Show all posts

Saturday, January 25, 2020

पानी जैसा मन हो जिसका



जीवन में जब कुछ ऐसा घटे जिसका कारण समझ में न आये तो यह मानकर विश्राम कर लेना चाहिए कि समस्त कारणों का परम कारण परमात्मा है. यही वास्तविक ज्ञान है. जो विश्वासी है वही आत्मविश्वासी भी हो सकता है. आत्मनिष्ठा और ज्ञाननिष्ठा के बिना की गयी साधना काम नहीं आती. साधना का अर्थ है मन की तरलता. मन में किसी बात को ठहरने नहीं देना तथा वर्तमान में मुक्त हृदय से आगे बढ़ना. जब भी मन किसी घटना, वस्तु या व्यक्ति में राग-द्वेष करता है, वह अटक जाता है. मन यदि पानी की तरह बहता हुआ न रहे तो उसमें काई जम जाती है और उससे दुःख की गन्ध आने लगती है. हर मानसिक दुःख यही बताता है कि भीतर कुछ ठहर गया है. प्राणायाम के द्वारा, प्रकृति के साथ समय बिताकर, संगीत में या ध्यान में मन को लय होने देना इससे बाहर आने का निरापद उपाय है. जीवन में उल्लास का फूल खिलाना हो तो स्वयं को खोने की कला सीखनी ही होगी. खिलाड़ी खेल में खुद को भुला देता है, नर्तक नृत्य में और भक्त भक्ति में डूब जाता है. छोटा मन जब खो जाता है तभी परम आनंद प्रकट होता है.

Monday, June 8, 2015

मुक्त सदा ही रहता है वह

सितम्बर २००९ 
परमात्मा सृजन तो करता है, सृष्टा तो है पर कर्ता नहीं. शास्त्र कहते हैं परमात्मा नर्त्तक है, वह है और नृत्य भी हो रहा है, नृत्य उसके बिना नहीं हो सकता पर वह नृत्य के बिना भी हो सकता है. परमात्मा प्रकृति के साथ एक भी है और भिन्न भी. सारी प्रकृति वर्तती है उसकी उपस्थिति में ही, पर परमात्मा स्वयं नहीं वर्तता ! उसकी मौजूदगी ही काफी है. जो इस मौलिक तत्व को समझ लेता है वह कर्तापन के भाव से मुक्त होकर जीता है. प्रकृति बड़ी शांति से अपना काम करती है यह जानकर हमारी पकड़ छूट जाती है.