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Monday, October 1, 2018

बापू का पैगाम सुनें

१ अक्तूबर २०१८  
कल दो अक्तूबर है, महात्मा गाँधी की एक सौ उनचासवीं जयंती ! आज समय-समय पर पढ़े उनके संदेश याद आ रहे हैं. उनकी बातें एक सूत्र के रूप में कितना गहरा अर्थ छुपाये होती थीं. उनके चेहरे पर पोपले मुख की मुस्कान इसकी साक्षी है जब वह कहते थे, हंसी मन की गांठे बड़ी आसानी से खोल देती है  जहाँ प्रेम है वहाँ जीवन है । उनका जीवन सत्य पर किया गया एक प्रयोग है, जिससे उन्होंने जाना कि क्रोध एक प्रकार का क्षणिक पागलपन है । उन्हें किताबों से बहुत प्रेम था. उनके अनुसार, पुस्तकें मन के लिए साबुन का काम करती है, क्योंकि वे मानते थे कि ज्ञान का अंतिम लक्ष्य चरित्र निर्माण है । देह से दुबले पतले होते हुए भी बापू भीतर से निडर थे, उन्हें ब्रिटिश सरकार की हुकूमत झुका नहीं पायी, वह कहते थे, डर शरीर का रोग नहीं है यह आत्मा को मारता है । कुछ लोग कहते हैं, बापू को सौन्दर्य बोध नहीं था, पर उनके अनुसार वास्तविक सौंदर्य हृदय की पवित्रता में है । वह पेशे से वकील होते हुए भी कहते हैं, दिमाग को हमेशा दिल की सुननी चाहिए ।

Tuesday, July 18, 2017

राम रतन धन पायो

१८ जुलाई २०१७ 
संत कहते हैं, जिसकी हमें तलाश है वह मिला ही हुआ है. वे कहते हैं, यकीन कर लें और अपनी जेबें जरा टटोलें, हीरा पड़ा है.. जो इस बात पर यकीन करके खोजेगा सचमुच हीरा मिल जाएगा. मिलते ही जोर से हँसी आती है तब. खुद को ही खोजते-फिरते रहे थे, खुद को ही मिल नहीं पाते. जिनकी नजरें सदा बाहर लगी हैं भीतर कभी झांक ही नहीं पाते. एक दिन जब उसकी खबर हो जाएगी जो भीतर छिपा है तब एक ऐसा फूल खिलेगा, जो कभी नहीं मुरझाता. ऐसा नहीं होता तो कोई दिल भक्ति के गीत नहीं गाता.


Monday, December 12, 2016

पल पल साथ बना है जिसका

 १३ दिसम्बर २०१६ 
अस्तित्त्व ने हमें सब कुछ दिया है, यह सुंदर सृष्टि उसने हमारे लिए ही बनाई है. इस जाते हुए वर्ष के अंतिम दिनों में एक बार रुककर हम भी यह क्यों न पूछें कि  वह हमसे क्या चाहता है, उसके प्रति हमारा क्या देय है. हम उसे क्या उपहार दे सकते हैं. शायद वह इतना ही चाहता है कि हम उससे जुड़े रहें, उससे अपने दिल का हाल  कहें, पल-पल घटने वाले उसके चमत्कारों को आश्चर्य भरे भाव से निहारें। वर्तमान में चलते हुए हमारी नजरें सुखद भविष्य की ओर लगी रहें, जो हम भावी पीढ़ी के लिए छोड़ जाने वाले हैं.

Thursday, May 14, 2015

दिल में ही तो वह बैठा है

फरवरी २००९ 
“तुम जमाने की रह से आये, वरना सीधा था दिल का रास्ता” नजरें झुकाई और नमन हो गया, पलक झपकने से भी कम समय में दिल में बैठे परमात्मा से मुलाकात हो सकती है, पर हमारी आदत है लम्बे रास्तों से चल कर आने की. हम किताबें पढ़ते हैं, ध्यान की नई-नई विधियाँ सीखते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और न जाने क्या-क्या करते रहते हैं ! परमात्मा उस सारे वक्त हमें देखता रहता है, हम उसके सामने से गुजर जाते हैं, बार-बार उसे अनदेखा कर उसी को खोजने का दम भरते हैं. हम प्रेम को छोडकर ईर्ष्या को चुनते हैं ! प्रशंसा को छोड़ निंदा को चुनते हैं, सहानुभूति को छोड़ क्रोध को चुनते हैं. शांति को छोड़ शोर को चुनते हैं. एकांत को छोड़ भीड़ को चुनते हैं. सहजता को छोड़ दिखावे को चुनते हैं. हम वह सब करते हैं जो परमात्मा से दूर ले जाता है और उम्मीद करते हैं कि  हमारा पाठ, जप-तप उसके निकट ले जायेगा. ये तो ऊपरी वस्तुएं हैं, परमात्मा को जिस मन से पाना है उस मन में सब नकारात्मक है, निषेध है, ‘नहीं’ है, नकार है, तो वहाँ वह कैसे आएगा जो सबसे बड़ी ‘हाँ’ है, जो ‘है’, वास्तविक है, सत्य है, प्रेम है, शांति है, आनंद है, हमारा चुनाव ही भटकाता है, जीवन हर कदम पर हमें निमन्त्रण देता है, झूमने का, गाने का और प्रसन्नता बिखराने का, सहज होकर रहने का, पर हम उसे गंवाने की कसम खाकर बैठे हैं. 


Friday, December 5, 2014

किससे नजर मिलाऊँ तुझे देखने के बाद

जून २००७ 
किससे नजर मिलाऊँ तुझे देखने के बाद” जिसे एक बार अपने भीतर उस आनंद की झलक मिल जाये, वह खुद को ही भूल जाता है, संसार की तो बात ही और है. कवि कहता है, “अपना पता न पाऊं तुझे देखने के बाद” और ऐसा मन स्वालम्बी होता है, वह एक का शैदाई होता है, उसे जो चाहिए उसके लिए वह अपने ही दिल का द्वार खटखटाता है, वह जो चाहता है वह भीतर ही मिल जाता है. वह अनुभव अनोखा है, वह इस ब्रह्मांड की सबसे कीमती शै है !


Tuesday, November 4, 2014

बन जाये मन अपना राधा

अप्रैल २००७ 
कृष्ण हमारी आत्मा है, मन की भीतर लौटती हुई धारा ही राधा है. जैसे-जैसे मन भीतर जाता है उसे आत्मा से प्रेम हो जाता है. उसे प्रेम रोग लग जाता है. “दिल हमको लुटा बैठा, हम दिल को लुटा बैठे, क्या रोग लगा बैठे...” जिसके रोम-रोम में प्रेम का रोग लगा है वह है भक्त. दोनों का मिलन ही विश्राम को प्रकट करता है. वास्तव में हमारा मन, बुद्धि समाधान चाहते हैं, जगत उसे समाधान दे नहीं सकता, परमात्मा ही दे सकता है, जो आत्मा रूप में हमारे भीतर है. संसार में उलझा हुआ मन अपने पद से नीचे गिर जाता है, शहजादे से भिखारी बन जाता है. वह जो आत्मा की तरंग है उसी की जाति का है उसी को भुलाकर विजातीय से प्रेम करने लगता है, पर खुद से मिलने की जब याद आती है तो भीतर मिलने की तड़प जगती है और मन भीतर लौटने लगता है.  

Sunday, October 28, 2012

दिल का फसाना



बुराई की बहुत सारी शक्लें हैं, बहुत सारे चेहरे हैं, पर बुराई अपनी असली शक्ल हमें नहीं दिखाती. वह सदा अच्छाई का लिबास ओढ़ कर आती है, उसमें इतनी हिम्मत नहीं कि अपने असली रूप में सामने आये. हम जब असत्य बोलते हैं तो यही कहते हैं कि सत्य बोल रहे हैं. बेईमानी करने वाला भी स्वयं को ईमानदार घोषित करता है. फरेब, धोखा, जुर्म सभी इतने कमजोर हैं कि उनको करने वालों को उनसे कोई सहारा नहीं मिल सकता. विकारों में उतनी ताकत नहीं जितनी संस्कारों में है. मानव का हृदय दोनों में से किसी की आधीनता स्वीकार नहीं करता. दिल ही हमारा सच्चा निर्णायक है. वह हमारा साथ तभी तक देता है जब तक हम सच्चाई के रास्ते पर चलते हैं, गलत कार्य करना तो दूर उसका विचार ही हमारे दिल को बेकाबू कर देता है. वह धड़क कर हमसे शिकायत करता है, हमें टोकता है, कचोटता है जिससे हम पुनः सही मार्ग पर आ सकें. अपने दिल पर यदि किसी की हुकुमत चलती है तो वह है उस दिलबर कि जो सारी कायनात का मालिक है, जिसने इस खूबसूरत दिल को बनाया है, यह खूबसूरत भी तभी तक है जब तक इसमें उसका निवास है.

Thursday, September 8, 2011

आत्मा की भाषा


दिसम्बर २००१ 

परदेश में कोई अपनी भाषा बोलने वाला मिल जाये तो जैसी खुशी होती है वैसी ही ध्यान में स्वयं को परमात्मा से मिलकर होती है... हमारी आत्मा उसी की भाषा बोलती है, मौन की भाषा ! जबकि मन संसार की भाषा बोलता है.. तभी दिल व दिमाग में द्वंद्व बना ही रहता है. यही द्वंद्व सारे तनाव का कारण है. ध्यान में चेतन मन शांत हो जाता है. मौन में संवाद होता है जिसकी भाषा अनूठी है और ध्यान से आने के बाद भी उसकी तरंगे मन तक पहुंच जाती हैं, कुछ पल को वह भी आत्मा के संग हो लेता है पर फिर दुनियादारी की धूल उस पर चढ़ जाती है, इसीलिए नियमित ध्यान वैसे ही जरूरी है जैसे नियमित स्नान.

Wednesday, August 3, 2011

स्वर्ग-नर्क


जुलाई २००१ 
जब हमारे दिल मिले हों, स्वर्ग निकट है. मन जब झील के शांत पानी की तरह स्वच्छ और स्थिर होगा तो आत्मा की झलक हम देख पाएंगे. जब भौतिक वस्तुओं का उतना ही आदर होगा जिसके वे योग्य हैं तो हम स्वर्ग के निकट हैं. जब अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिये हम दूसरे को तुच्छ मानते हैं तो नर्क में ही होते हैं. हमारे मन में कामना यदि संसार की होगी तो पूरी होने पर अहंकार को तथा पूरी न होने पर विषाद को जन्म देगी. कामना परम की होगी तो शांति का अनुभव पहले ही होने लगता है... पूरी होने के बाद की शांति की तो हम कल्पना ही कर सकते हैं...अर्थात अपना स्वर्ग व नर्क हम स्वयं ही गढ़ते हैं.