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Monday, October 8, 2012

ज्ञान साधना है


सितम्बर २००३ 
ज्ञान हमें मुक्त करता है. आत्मभाव में स्थित रहें यही तो ज्ञान है. ज्ञान में स्थित रहकर यदि कोई सत्य का अनुसंधान करता है, जगत उसके लिए अमृत बन जाता है. अनन्य निष्ठा तथा अनवरत सुमिरन और उसे पाने की चाह यदि बनी रहे तो ज्ञान हृदय में स्थिर होगा. हमारा मन उन्मुक्त गगन में विचरण करेगा. भीतर जो कतरा है वही दरिया बन जायेगा. कभी ऐसा भी प्रतीत हो कि कहीं न कहीं हमारे कर्त्तव्य निर्वाह में त्रुटि हो रही है, पर इससे मन की प्रसन्नता तथा शांति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वह अखंड है, वह परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती. आत्मभाव में रहने वाला मन अब यूँही विषादग्रस्त कैसे हो सकता है. वह निर्भार, निर्दोष और सहज होकर पल-पल आनंद में जीता है.

Friday, May 25, 2012

छिपा है सागर इक कतरे में


मार्च २००३ 
कभी कतरे को दरिया समझ कर डूब जाते थे
मगर अब निर्मल दरिया को भी कतरा समझते हैं....
सत्य हमें प्रेम और बल से भर देता है. उसका खजाना तो सदा है पर चाबी हमारे हाथ नहीं आती, उस चाबी का पता हमें साधना के रूप में मिलता है. इस खजाने की हिफाजत भी आवश्यक है, कहीं इसे पाकर सूक्ष्म अहंकार पुनः न दबोच ले. स्वयं को निरंतर कसौटी पर कसना है, स्वयं को बख्शना नहीं है और अन्यों की गलतियों पर ध्यान भी नहीं देना है. जो कर्म में सजग है वही ध्यान में भी सजग रहेगा.