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Monday, June 15, 2015

भीतर भी है इक आकाश

जनवरी २०१० 
संत जन कहते हैं भीतर ही परमात्मा है. यदि ऐसा है तो क्यों नहीं हर कोई अपने भीतर जाकर सुख राशि को खोज लेता ? हर कोई भीतर जाना नहीं सीखता, बाहर ही उसे इस तरह बांधे रहता है कि कोई भीतर है भी इसका भी उसे भरोसा नहीं होता. दिन-रात जो बाहर ही रहता है उसे पता ही नहीं चलता कि उसके भीतर भी एक आकाश है जहाँ सूरज उगता है वह अपने भीतर के हिरण्यमय कोष से अनजान ही रह जाता है. भीतर की दुनिया उसे दूर की, रहस्यमयी सी प्रतीत होती है जबकि बाहर से उसका दिनरात का नाता होता है.

Saturday, April 7, 2012

निर्बल के बल राम


जनवरी २००३ 
हमारे भीतर आत्मा का सूरज चमक ही रहा है, उसका प्रकाश बाहर आये यही साधना है. आत्मनिंदा साधना के लिये ठीक नहीं, आत्म पूजा ही हमारी रीत होनी चाहिए. अंतर शुद्धि और बाह्य शुद्धि इसके लिये पहला कदम है. संतोष, सरलता तथा प्रेम को धारण करते हुए सदा आनंदित रहना दूसरा.. क्रोध तभी आता है जब हम ज्ञान के बल से विहीन होते हैं, अविद्या और अज्ञान ही हमें जन्मों से दुःख व पीड़ा दे रहे हैं. यदि कभी क्रोध आ जाये तो “निर्बल के बल राम” को याद रखना होगा. पूर्ण समर्पण हो अस्तित्त्व के प्रति अथवा सदगुरु की शरणागति. मन को खाली करना है ताकि वहाँ प्रकाश भर सके. ऐसा प्रकाश जो प्रेम मय है, आनंद मय है शांति मय है...
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