नवरात्रि उत्सव के प्रथम तीन दिन मां दुर्गा को, मध्य के तीन दिवस माँ लक्ष्मी को तथा अंतिम तीन दिवस सरस्वती मां को समर्पित हैं. साधक को पहले शक्ति की आराधना द्वारा तन, मन व आत्मा में बल का संचय करना है, इसके लिए ही योग साधना व प्राणायाम द्वारा चक्र भेदन किया जाता है जिससे शक्ति प्राप्त हो. इसके बाद उस शक्ति के द्वारा भौतिक संपदा के साथ-साथ मानसिक षट संपत्ति की प्राप्ति होती है. इस शक्ति का सदुपयोग हो सके इसके लिए ज्ञान की आवश्यकता है. शक्ति यदि अज्ञानी के हाथ में पड़ जाये तो लाभ की जगह हानि का कारण ही बनेगी. इसीलिए वाग्देवी की आराधना होती है अर्थात ज्ञान की प्राप्ति के लिए अध्ययन, मनन व चिंतन किया जाता है. भारत की अद्भुत संस्कृति में हर उत्सव हमें उस परम की ओर ले जाने का एक साधन है. हर कोई अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार इन उत्सवों से प्राप्त सन्देश को अपनाकर अपने जीवन को आगे ले जा सकता है.
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Saturday, October 24, 2020
Sunday, May 10, 2020
ममता की जो मूरत है
धरती को हम माँ कहकर बुलाते हैं. नदियों को भी माँ का दर्जा देते हैं. बच्चा जो भाषा सर्वप्रथम सीखता है, उसे भी मातृ भाषा कहा जाता है. भारत की महान संस्कृति में माँ को बहुत सम्मान दिया गया है. गौरी-शंकर, सीता-राम हो या राधा-श्याम - पहले माँ का नाम आया है. ज्ञान की देवी सरस्वती माँ, धन की देवी लक्ष्मी माँ और शक्ति की देवी पार्वती माँ की पूजा देवता भी करते हैं. सृष्टि के सृजन में तथा उसके पालन में माँ के योगदान को कौन नकार सकता है. माँ का प्रेम उस आकाश की तरह विशाल होता है जो सबको आधार देता है और उस सागर की तरह गहरा होता है जिसकी गहराई को कोई माप नहीं सकता. माँ संतान से कुछ नहीं चाहती, वह केवल उसे प्रसन्न देखना चाहती है. संतान कितना भी नाम, धन कमा ले पर माँ उसकी आवाज सुनकर ही जान जाती है कि वह सुखी है या किसी बात से चिंतित. अवश्य ही परमात्मा ने उसके हृदय में कोई सूक्ष्म यंत्र लगाया है जिससे वह बच्चे की आँखों को पढ़ लेती है, दूर होने पर उसकी आवाज को पढ़ लेती है और दुआओं का एक दरिया उसके अंतर से सहज ही बहने लगता है. मातृ दिवस पर माँ होने के उस अहसास को नमन जो हर कोई अपने दिल में जगा सकता है. प्रेम का वह स्रोत यदि भीतर जाग जाये तो उसकी झलक पा सकता है.
Sunday, June 16, 2019
तुम मात-पिता हम बालक तेरे
आज पितृ दिवस है. माता-पिता
दोनों के अंश से एक बच्चे का जन्म होता है. जीवन में दोनों का समान महत्व है. माँ
शिशु को पालती है और पिता उसे आश्रय देता है. पिता के अनुशासन और माँ के स्नेह की
छाया में ही एक शिशु का पूर्ण विकास सम्भव है. गहराई से देखें तो दोनों के भीतर एक
साथ दोनों का निवास है. एक माँ जब बच्चे को ताड़ना देती है तो उसके भीतर का पिता
पक्ष प्रमुख होता है, वैसे ही जब पिता दुलार देता है तो उसके भीतर की माँ सशक्त हुई
होती है. हम परमात्मा को भी माता-पिता दोनों एक साथ कहते हैं, अनुकूल परिस्थतियाँ
देकर वह हमें आनंदित करता है और विपरीत परिस्थतियाँ भेजकर मजबूत बनाता है.
Tuesday, March 20, 2018
काली दुर्गे नमो नम
२० मार्च २०१८
पार्वती, दुर्गा, भवानी, अंबा, सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी और संतोषी, देवी
माँ के विभिन्न नाम और रूप हैं. एक ही शक्ति नये-नये रूपों में व्यक्त होकर जगत को
प्रेरित करती है. पार्वती यानि पर्वत पुत्री के रूप में जो अचल रहना सिखाती है, दुर्गा के रूप
में जड़ता रूपी असुर का संहार करने की प्रेरणा देती है. जो व्यक्ति अथवा समाज जड़ हो
जाता है, वह विनाश को ही प्राप्त होता है. भवानी श्रद्धा का प्रतीक है तो अंबा
वात्सल्य का. सरस्वती ज्ञान प्रदायिनी है, लक्ष्मी समृद्धि दात्री है. गौरी मंगला
है और संतोषी जीवन में संतुष्टता का वरदान देती है. नवरात्र के दिनों में हम देवी
के किसी भी रूप की उपासना करें, अंतर में हर्ष होता है और वातावरण भी पावन होता
है.
Monday, March 12, 2018
प्रेम गली अति सांकरी
१३ मार्च २०१८
प्रेम आत्मा का मूल स्वभाव है. सृष्टि के कण-कण में प्रेम किसी न
किसी रूप में ओत-प्रोत है. सूर्यमुखी का पौधा सदा सूर्य की ओर तकता है, चकोर
बादलों की ओर, पतंगे दीपक की तरफ लपकते हैं और भंवरे फूलों की तरफ....ये उदाहरण तो
हम सबने सुने-पढ़े और देखे हैं. एक नवजात शिशु का माँ के प्रति प्रेम सहज ही होता
है, क्योंकि नौ माह तक वह माँ के तन का ही हिस्सा था. जन्म के समय उसे लगता है, मानो
वह स्वयं से ही दूर हो गया. स्वयं से जुड़ने की इसी प्यास का नाम ही प्रेम है. इसे
पाने के लिए ही बालक पहले गुड़ियों से प्रेम करता है, फिर मित्रों व परिवार से और
जब यह तलाश फिर भी पूर्ण नहीं होती तो वह भगवान से प्रेम करता है. परमात्मा भी जब
तक अन्य पुरुष बना रहता है, वह अतृप्त रहता है. परमात्मा को उत्तम पुरुष के रूप
में अनुभव करके अर्थात स्वयं के रूप में अनुभव करने के बाद ही मानव की तलाश पूर्ण
होती है. जन्म के समय जो स्वयं से बिछड़ा था, आत्म रूप में उसे ही पाकर वह तृप्त हो
जाता है.
Tuesday, May 23, 2017
प्रकृति से जो जुड़ जाये
२३ मई २०१७
प्रकृति का हर रंग मनोहारी है. वर्षा की रिमझिम हो या या कोहरे से ढकी सुबह, रात की नीरवता हो या भरी दोपहरी में पंछियों के स्वर. प्रकृति के निकट रहने का अवसर जिसे मिलता है वह इसके जादू से अप्रभावित कैसे रह सकता है. प्रकृति माँ है, वह अन्नपूर्णा है, पोषित करती है और यह प्रकृति एक परम शक्ति की अध्यक्षता में कार्यरत है. वह समर्पित है, तभी सहज है. जितना-जितना मानव प्राकृतिक वातावरण से दूर रहने लगा है उसका नाता परमात्मा से भी कट सा गया है. उसकी प्रार्थनाएं भी अब सहज नहीं रह गयीं हैं. हरे-भरे खेतों में दौड़ लगाते, नीले आकाश की छाया में गुनगुनाते हुए कृषक बालक कितने मुक्त प्रतीत होते हैं.
Sunday, June 21, 2015
हरी हरी वसुंधरा
फरवरी २०१०
वसुधा,
वसुंधरा, धरा, धरित्री, पृथ्वी, मही, भू, भूमि, मेदिनी, श्री, विष्णु पत्नी इतने
सारे नाम हैं धरती माँ के, हर एक का अलग अर्थ है. भू का अर्थ है होना. पृथ्वी जड़
नहीं, स्थिर नहीं किसी आकर्षण में बंधी घूम रही है. भूमि का अर्थ होने की
प्रक्रिया को आधार देने वाली अर्थात जिन्हें वह आधार देती है उन्हें भी एक दूसरे
के लिए क्रियाशील देखना चाहती है. धरा, धरित्री का अर्थ धारण करने वाली अर्थात
सहनशीलता, क्षमा, शक्ति, क्षमता. धरित्री माँ को भी कहते हैं. वह माँ की तरह उदार
है. वसुधा कहते हैं क्योंकि कितनी सम्पदा इसके पास है. वसु धन भी है और वसु रहने
का साधन भी है, वह देवता भी है, वसुधा का अर्थ इसलिए घर मात्र नहीं है, घर की
आत्मीयता भी है. पृथ्वी का अर्थ विस्तारवाली है. विष्णु ने मधु-कैटभ का वध किया
उसके मेद से बना स्थूल पिंड, तभी वह मेदिनी कहलायी. श्री भूदेवी है, आश्रय देने
वाली. इन सब अर्थों को लेकर पृथ्वी की आराधना करें तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ
समझ में आता है, शेष इस पर रहने वाले लोगों की आत्मीयता से बनता है.
Thursday, January 10, 2013
माँ के जैसा ही वह है
जनवरी २००४
जैसे माँ बच्चे के रूप में अपना विस्तार करती है, फिर उसे प्रेम देती है व प्राप्त
करती है, वैसे ही परमात्मा ने हमें सिरजा है, भक्त और भगवान के बीच प्रेम का आदान-प्रदान
ही भगवत्ता को सार्थक करता है. जैसे बच्चे माँ को भुला देते हैं, वैसे ही हम परम
को भूल जाते हैं, पर तब भी वह हमें चाहते हैं वह सदा प्रतीक्षा रत हैं कि हम उनके
निकट जाएँ जैसे माँ को बच्चों की सदा एक आस बनी रहती है. हमारे भीतर के सद्गुण
रूपी देवता उसी परमात्मा की आराधना करते हैं और दुर्गुण रूपी असुर उससे उत्पीड़ित होते
हैं. शुभ-अशुभ दोनों को वह ही रचता है और दोनों से परे वह अव्यक्त है. वह हमारे
भीतर तीन रूपों में विद्यमान है, क्रिया, ज्ञान और भावना. वही कर्म के लिए प्रेरित
करता है, वही हमें हमारे होने का ज्ञान देता है ज्ञान जब भीतर रच-बस जाता है वही
भक्ति में बदल जाता है. मुक्त हुए बिना भक्ति सम्भव नहीं. यह त्रिवेणी जब जीवन में
उतरती है तो जीवन का हर क्षण सुंदर बन जाता है.
Friday, November 2, 2012
काली दुर्गे नमो नमः
अक्तूबर २००३
माँ काली का रूप भयानक है, उसके पीछे भी एक रहस्य है. यदि उसके प्रति समपर्ण हो तो
भय नहीं रहता, क्योंकि एक ही चेतना प्रेम या भय के रूप में प्रकट होती है, जहां
प्रेम है वहाँ भय नष्ट हो जाता है. जो काली से प्रेम करेगा वह निर्भय हो ही
जायेगा. उसके हाथ में कटा सिर है, अर्थात अहं का नाश करती है. कटे हुए हाथों का
अर्थ है कर्मों का कट जाना. काली कृपा का प्रतीक है, वह मौन है, ज्ञान की अनंत
शक्ति है, वह शिव के ऊपर स्थित होकर ही शांत होती है. शिव ही शांत मौन चेतना है,
उसमें जब ज्ञान शक्ति का उदय होता है तभी वह मंगलकारिणी होती है.
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