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Friday, March 22, 2013

मुक्त करेगा प्रेम


जून २००४ 
संतजन कहते हैं, परमात्मा अन्तर्यामी है, वह सभी के हृदय का साक्षी है, वे आनन्दस्वरूप हैं, पर भक्तों के प्रेम में वे भी आनंद पाते हैं. जिस तरह भक्त भगवान को प्रेम करते हैं, वे भी करते हैं. प्रेम के इस आदान-प्रदान में भक्त और भगवान एक अनोखे आनंद का अनुभव करते हैं. हर वस्तु का स्वभाव ही उसका धर्म है, हमारा स्वभाव आनंद है उसमें बाधा आते ही हम विचलित हो जाते हैं, हमारा सहज स्वभाव ही प्रेम पाना व प्रेम देना है, पर यह प्रेम सहज और विशुद्ध होना चाहिए अग्नि की तरह, सूक्ष्म होना चाहिए आकाश की तरह, ईश्वर की तरफ प्रेम भरी नजर उठते ही सद्गुरु की कृपा होती है, वह हमें रसमय, मधुमय बनाते हैं.

Thursday, May 17, 2012

प्रेम दीवाने जो भये


मार्च २००३ 
प्रेम दीवाने जो भये, मन भयो चकनाचूर, छकत रहे घूमत फिरे, सहजो कहत हजूर ! हृदय में ईश्वर के लिये प्रेम होगा तो एक नादान बालक की रक्षा जैसे माँ करती है, वैसे ही वह अन्तर्यामी हमारे कुशल क्षेम का भार उठा लेगा. वह, जिसे हमारे पल-पल की खबर है, उसके लिये हृदय में चाह तीव्र से तीव्रतर होती जाये तो वह स्वयं को प्रकट करता है. जैसे भक्त भगवान की राह देखता है भगवान भी उसकी राह देखते हैं. अंतर्मन यदि पूरी तरह खाली हो जाये और संसार की कोई लालसा शेष न रहे तो वह उसमें आ विराजता है. उसके कदम पड़ते ही भीतर प्रकाश हो जाता है, इस अनंतता में हम हैं, अनंत हमारे साथ है, यही अहसास रह जाता है, अपने पास होने का अनुभव और सारी दुविधाओं का नाश एक साथ ही घटित होते हैं. तब कृतज्ञता वश नेत्रों में जल भर आता है या हृदय में ऐसी कचोट उठती है कि उसे शब्दों में कहना संभव नहीं. देहाध्यास को मिटाते जाना है उस परम को पाने के लिये.