तेन त्यक्तेन भुंजीथा
परमात्मा हर पल हमारे मन का द्वार खटखटाता है, हम कभी खोलते ही नहीं। वह तो स्वयं प्रकट होने को आतुर है, वह प्रतिपल बरस रहा है, उसे देखने की नजर भीतर पैदा करनी है। चेतना का आरोहण करना है, भीतर जो अनंत ऊर्जा है उसे एक आकार देना है। जो स्वयं के प्रतिकूल हो वह कभी किसी दूसरे के साथ भूलकर भी नहीं करना है, क्योंकि दूसरों को दिया दुःख अंततः अपने को ही दिया जाता है। हमें अपने ‘होने’ की सत्ता को सार्थक करना है, अपने होने के प्रयोजन को सिद्ध करना है।हम अपनी पूर्ण क्षमता को विकसित कर सकें, जो बीज में सुप्त है, वह फूल बन कर खिले। जीवन का अर्थ क्या है, इसे जानें। हम किस निमित्त हैं, हम किसका माध्यम हैं, किसके यंत्र हैं, किसके खिलौने हैं, इस विशाल आयोजन में हमारा भी योगदान हो। हमारेपास जो भी है, देह, मन, बुद्धि सभी उसके काम आ जाये, हम उसके सहचर बन जाएँ। सन्नाटे में भी जो हमारे साथ रहता है, अँधेरी स्याह रात्रि में, निस्तब्धता में भी जो हमारे निकटतम है, उसके हाथ में स्वयं को सौंप कर निश्चिन्त हो जाना है।जिसे ऐसी प्रसन्नता चाहिए जो अपह्रत न हो सके, खंडित न हो सके, बाधित न हो सके, उसे अपना अंतःकरण अस्तित्त्व के प्रति खोल ही देना होगा। समता, स्थिरता, संतुलित रहना ये सभी तो सहजता से मिलते हैं। समाधान साथ-साथ चलता रहे तो अंतःकरण मोद से भरा रहता है। जो संकल्प को छोड़ना जानता है, वही उसे सिद्ध भी करता है, जो त्यागना सीख गया, वह सब पाना सीख गया!
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