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Wednesday, November 14, 2018

समाधान दिलाये योग


१४ नवम्बर 2018
भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं, जो न किसी से उद्ग्विन होता है न किसी को उद्ग्विन करता है, वह मुझे प्रिय है. इसका अर्थ हुआ हम जगत में इस तरह रहना सीख लें कि किसी को हमसे कोई परेशानी न हो, और न जगत ही हमारे लिए कोई समस्या बने. प्रगाढ़ नींद में ऐसा ही होता है, जगत होते हुए भी नहीं रहता और हम जगत के लिए अदृश्य हो जाते हैं. समाधि में भी ऐसा होता है, जगत का भान नहीं रहता और देह भान भी नहीं रहता, देह से ही जगत आरम्भ होता है. इसका अर्थ हुआ कि जगते हुए भी समाधि में बने रहने की कला आ जाये तभी यह सम्भव है. समाधि के लिए योग साधना में बताये यम, नियम का पालन पहला कदम है, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार दूसरा तथा धारणा व ध्यान के तीसरे कदम के बाद समाधि तक पहुंचा जा सकता है. इसीलिए कृष्ण बार-बार अर्जुन को योगी बनने के लिए कहते हैं.

Friday, July 28, 2017

एक उसी की चाहत हो जब

२८ जुलाई २०१७ 
साधक के लिए सबसे जरूरी बात है कि वह प्रामाणिक बने. उसे अपने मन की गहरी आकांक्षा को जानना होगा. अध्यात्म के मार्ग पर चलकर वह क्या पाना चाहता है. परमात्मा और उसके मध्य यदि कोई भेद अब भी शेष है तो इसका कारण परमात्मा नहीं साधक के मन का दुराव है. यदि किसी क्षण में वह अपने मन को पूरी सच्चाई से परम के सामने खोल कर रख देता है, कोई छिपी हुई कामना अनदेखी नहीं रहती जिसे वह परमात्मा के द्वारा पूरा करना चाहता है, उसी क्षण मिलन घटता है. स्वयं को जानने के लिए ही योग साधना है. आसनों के द्वारा देह शुद्धि तथा ध्यान के द्वारा मन की स्थिरता प्राप्त करके ही हम स्वयं को जान सकते हैं. इससे पहले की गई भक्ति सकाम भक्ति होती है. जब तक हम परमात्मा से मांगते हैं पर परमात्मा को नहीं मांगते तब तक मुक्ति सम्भव नहीं.

Monday, February 20, 2012

बालवत् ही स्वर्ग का अधिकारी है


दिसंबर २००२ 
शिशु नैसर्गिक होता है. सहज होता है. समाज में रहकर धीरे-धीरे वह निज स्वभाव को भूलता जाता है. उसके मूल स्वरूप पर धूल जमने लगती है. साधना हमारे मूल स्वरूप को उजागर करती है. इस के द्वारा हम पुनः सहजावस्था को प्राप्त होते हैं. बड़े होने के क्रम में जो भी अवांछित हमने सीखा है उसे अनसीखा करते हैं. बच्चे की तरह वर्तमान में रहते हैं, वह एक पल रो रहा है अगले ही पल हँसने लगता है. हम शिशु के रूप में कई योग मुद्राएँ व आसन आदि कर चुके होते हैं, इन्हें पुनः करने पर आसानी से सीख जाते हैं. हमारे शरीर के विभिन्न अंगों में विभिन्न भाव व संवेदना जुड़ी है. मूलाधार आसक्ति, जड़ता व उत्साह का केन्द्र है. स्वाधिष्ठान सृजनात्मकता व काम वासना का केन्द्र है. नाभि के पास मणिपुर लोभ, ईर्ष्या, उदारता व संतोष का केन्द्र है. हृदय के निकट अनहत द्वेष, भय व प्रेम का केन्द्र है. कंठ पर विशुद्धि कृतज्ञता व दुःख का केन्द्र है. मस्तक पर आज्ञा, ज्ञान व क्रोध का केन्द्र है. सिर की चोटी पर सहस्रार आनंद का केन्द्र है. साधना से ये सारे केन्द्र जागृत होते हैं सकारात्मकता बढ़ती है.