भगवद्गीता में कृष्ण ने कहा है, गुण ही गुणों में वर्तते हैं. हम अपनी सात्विक, राजसिक, तामसिक प्रकृति के अनुसार कर्मों को करते हैं. यही गुण हमारे कर्मों का कारण बनते हैं और हम स्वयं को कर्ता मानकर उनके द्वारा प्राप्त सुख-दुःख का भोग करते रहते हैं. यह क्रम जाने कब से चलता आ रहा है. अंतर्मुखी होकर जब साधक इस सत्य को देखता है तो गुणातीत होने की तरफ उसके कदम बढ़ते हैं. जब साक्षी भाव बढ़ने लगता है तो वह गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता. यदि तमस के कारण भीतर प्रमाद है तो वह उसके वश में नहीं होता, मन यदि चंचल है तो यह जानकर कि रजोगुण बढ़ा हुआ है वह ध्यान का प्रयोग करता है. सत्व में स्थित होने पर शांति का भी भोक्ता नहीं बनता बल्कि स्वयं को सदा ही अलिप्त देखता है.
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Friday, July 17, 2020
Tuesday, November 26, 2013
बनी रहे वह स्मृति पल पल
अप्रैल २००५
हम सोचते हैं कि मन सध
गया, पर यह सूक्ष्मरूप से अहंकार को सम्भाले रहता है. देहात्म बुद्धि में रहने पर
मन हावी हो जाता है. आत्मा में जो स्थित हो गया उसे कोई बात विचलित नहीं कर सकती.
जगत में रहकर अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए वह अलिप्त रह सकता है. वह अपनी
मस्ती में रहता है, परम की स्मृति उसे प्रफ्फुलित किये रहती है. आनन्द का एक स्रोत
उसके भीतर निरंतर बहता रहता है, एक पल के लिए भी यदि उसमें अवरोध हो तो उसे
स्वीकार नहीं होता. एक क्षण के लिए भी मन में छाया विकार उसे व्यथित कर देता है. जगत
उसके लिए परमात्मा को पाने का साधन मात्र बन जाता है. वह खुद को जगत के लिए उपयोगी
बनाने का प्रयत्न करता है. वह प्रेम ही हो जाता है.
Monday, March 4, 2013
जरा सामने तो आओ...
मई २००४
यह जो एक नामालूम सी कसक
भीतर छायी है, यह जो अनजानी सी पीड़ा ने मन को व्यथित किया है, यह विरह की पीड़ा है.
चैन नहीं लेने देती यह, मन को पल-पल जलाती है, तड़पाती है, इसे नाम नहीं दिया जा
सकता पर यह है वही, वह नहीं मिलता जब, तभी यह अभाव मन को खटकता है, पर वह तो नित
हमारे साथ है, फिर यह दर्द क्यों , वह है पर मन पर पर्दा पड़ा है, वह छिप गया है.
वह मिला तो गर्व हो गया अब उस गर्व को मिटाने
के लिए यह पीड़ा रूपी औषधि लेनी है. जो भी हो रहा है, उसे साक्षी भाव से देखना है,
भोक्ता नहीं बनना है, यह सोचते ही मन हल्का होने लगता है. जो कुछ भी हो रहा है वह
मन के बाहर की बात है, जैसे सड़क के किनारे खड़े होके देखें तो अनगिनत लोग गुजर जाते
हैं, हम अलिप्त रहते हैं, वैसे ही मन को देखते जाना है, मन में तरंगे उठती हैं,
गिरती हैं, हम उसके द्रष्टा हैं, द्रष्टा भाव दिया है उसी परमात्मा की शक्ति ने,
इसके पार वही तो है.
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