जुलाई २००५
प्रत्यक्ष
ज्ञान ही प्रज्ञा है और ऐसी समाधि जो प्रज्ञा की ओर ले जाये वही सम्यक समाधि है.
कभी-कभी ध्यान में हमें ऐसे अनुभव होते हैं, जिनका वर्तमान जीवन से कोई सम्बन्ध
नहीं होता, सम्भवतः वे हमारे पूर्व जीवन
से सम्बन्धित होते हैं, तब ज्ञान होता है कि इस शरीर से कैसा मोह, न जाने कितने
शरीर हम धारण कर चुके हैं, हर बार वही कहानी दोहराई जाती रही है, बस अब और नहीं,
अब और इस झूले में नहीं बैठना जिसका एक सिरा ऊपर जन्म फिर नीचे मृत्यु की ओर ले
जाता है. अब स्वयं को जानकर उसमें स्थित होना है, संतजन कहते हैं, पलक झपकने में
देर लग सकती है पर अपने स्वरूप में स्थित होने में उतनी भी देर नहीं लगती. साधना
के द्वारा हम अपने स्वरूप की झलक तो पा ही लेते हैं, पर यह स्थिति सदा बनी नहीं
रहती, क्योंकि जब तक अहंकार शेष है पर्दा बना ही रहेगा.