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Saturday, August 30, 2014

पल भर भी न स्वयं को भूलें

फरवरी २००७ 
साक्षी होकर रहना ही ध्यान है, आत्मा द्रष्टा है, अज्ञान के कारण वह स्वयं को कभी देह, कभी मन, कभी बुद्धि तथा कभी अहंकार मानता है और व्यर्थ ही सुख-दुःख का भागी बनता है. यहाँ जो कुछ भी दिखाई देता है वह नष्ट होने वाला है. यहाँ दो ही कृत्य हो रहे हैं - जो भी उत्पन्न होता है वह नष्ट हो जाता है. अध्यात्म हमें वास्तविकता की ओर ले जाता है, वह हमें पाप-पुण्य दोनों से मुक्त करता है. तब हम कर्ता नहीं रहते. जब हम कर्ता नहीं हैं तो कोई दूसरा भी कर्ता कैसे हो सकता है. अतः किसी को दोषी देखना भूल ही है. व्यर्थ ही ऐसा करके हम अपने मन में विचारों का बवंडर खड़ा कर लेते हैं, जबकि साधक का लक्ष्य तो स्वयं को इन विचारों से मुक्त करना है. इस मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलने जैसा ही है, थोड़ी सी असावधानी से हम अपने स्वरूप से हट जाते हैं, थोड़ी देर के लिए अपने शुद्ध स्वरूप को भूल जाते हैं.


Sunday, January 13, 2013

हर पथ उसकी ओर जा रहा


जनवरी २००४ 
क्रिया के कारण भीतर के आनंद का हमें पता चलता है. क्रिया और ज्ञान दोनों का समन्वय हो तभी हम अध्यात्म के पथ पर चल सकते हैं. धर्म व्यवहारिक हो तभी चेतना का विकास हो सकता है, चेतना का रूपान्तरण ध्यान के द्वारा किया जा सकता है. ध्यान हमारी सुप्त चेतना को जागृत करता है. सत्य हमारे भीतर है उसे खोजकर यदि हम जगत में व्यवहार करें तो ही हम सही रूप से उसका उपयोग कर सकते हैं. हम प्रतिक्षण अपने आप से प्रश्न करें कि क्या मेरा यह क्षण बंधन का कारण बनने वाला है या मुक्त करने वाला है. सर्वप्रथम शत्रु अहंकार है जिससे हमें सजग रहना है, बहुत सूक्ष्म होता है यह अहंकार और यह भी हिंसा का कारण बन जाता है, हम स्वयं में इतने न खो जाएँ की अन्य हमें बाधा स्वरूप लगें, हम इतने न बंध जाएँ कि छूटने में भी दर्द हो. हम अपनी कोहनी भर जगह तो अपने चारों और रखें ही ताकि सरलता से चल सकें और किसी को चोट भी न लगे. हमारा कोई व्यवहार किसी को चोट पहुंचाता हो तो उसकी भनक स्वयं को पहले लग जाती है. वह  परमेश्वर परब्रह्म सच्चिदानंद स्वरूप हमारे साथ जो है, वह सदा सचेत करता रहता है. उससे प्रीति होना इतना सरल व सहज भी नहीं है, तलवार की धार पर चलने जैसा है पर एक बार यदि चलना आ जाये तो भीतर की सच्चाईयाँ प्रकट होकर स्वयं राह बताती हैं तब वह सुह्रद स्वयं हमारा हाथ पकड़ कर सही पथ पर ले जाता है, तब गिरने का भी नहीं रहता. शरण में जाने के बाद उत्तरदायित्व उसका हो जाता है, कितनी भी बाधाएं आयें कोई भय नहीं क्योंकि उस निर्भय का साथ जो है.    

Wednesday, June 15, 2011

सजगता


मई २००० 

म ईश्वर को प्रार्थना में माता-पिता तो कह देते हैं पर न तो पिता की आज्ञा में रहते हैं न माँ के वात्सल्य के पीछे छिपे उसके भाव का आदर करते हैं, फिर यदि मनमानी करने वाले तथा माँ के  प्रेम को नकार कर जाने वाले पुत्र की तरह दुःख को प्राप्त हों तो इसमें आश्चर्य क्या ? कभी कभी लगता है कि ईश्वर पर विश्वास करना, उसके बताए मार्ग पर चलना, उसे सब कुछ सौंप कर खाली हो जाना कितना सहज है, लेकिन यह कार्य सचमुच तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन है. क्योंकि जरा से  हम सचेत नहीं रहे तो संसार उस हृदय पर अपना अधिकार जमा लेता है जहाँ एकनिष्ठ प्रभु का अधिकार होना चाहिये था.