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Thursday, August 30, 2012

आत्मा केन्द्र है


जुलाई २००३ 
सदगुरु हमें अपने सच्चे स्वरूप का परिचय देते हैं और वहाँ तक जाने का रास्ता भी बताते हैं. और एक बार जब उस पथ के यात्री हम बन जाते हैं तो लगता है वास्तविक जीवन अब शुरू हुआ है. तब यह जगत एक खेल प्रतीत होता है. यहाँ सब कुछ बदल रहा है यह स्पष्ट होने लगता है. हमारा अंतः करण ही तब एक मात्र स्थिर प्रतीत होता है, सदा एक सा, हम केन्द्र में स्थित हो जाते हैं. तब संसार के झूले के झकोरे हमें नहीं झुलाते. हम द्रष्टा भाव में आ जाते हैं. यह जगत दृश्यमान है हम उससे पृथक हैं. जैसे जल में नाव जल से पृथक है. कीचड़ में कमल की तरह हम निर्लिप्त हो जाते हैं. सारे कार्य पूर्ववत होते हैं, पर जैसे प्रकृति अपना खेल देख रही होती है. तीनों गुणों के आधीन होकर हम जगत का व्यवहार तो करते हैं पर स्वयं को इससे पृथक देखते हैं, शरीर, इंद्रिय, मन और बुद्धि अपना-अपना कार्य करते हैं, ऐसा स्पष्ट आभास होने लगता है.  

Monday, June 13, 2011

समता


मई २०००
जो टिकता नहीं वह जगत है और जो मिटता नहीं वह परम सत्य है. बस इतनी सी बात समझ में आ जाये तो ईश्वर के मार्ग पर चलना सहज हो जाता है. यह जगत हमें कई पाठ पढ़ाता है, ठोक-पीट कर इस काबिल बनाता है कि हम उस परम को जान सकें. जब कभी कृतज्ञता के भाव के कारण हृदय भर आता है, अथवा साधना के कारण सुख का अनुभव होता है तब भी यह स्मरण रखना होगा कि यह भी एक अवस्था है जो टिकने वाली नहीं है, सुखद अथवा दुखद दोनों ही अवस्थाओं से जो परे नहीं गया वह परम को नहीं पा सकता. अनुकूल या प्रतिकूल दोनों में जो सम रहना सीख गया वही उस पथ का यात्री है. हमारे भीतर अमृत भी है और विष भी, पर सत्य दोनों के पार है.