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Sunday, November 9, 2014

शरण गये सो तृप्त भये

अप्रैल २००७ 
धर्म को यदि धारण नहीं किया तो व्यर्थ है, नहीं तो हमारी हालत भी दुर्योधन की तरह हो जाएगी, जो कहता है मैं धर्म जानता हूँ पर उसकी ओर प्रवृत्ति नहीं होती और अधर्म जानता हूँ पर उससे निवृत्ति नहीं होती. जितनी हम उठा सकें उतनी जिम्मेदारी हमें उठानी ही चाहिए. जैसे-जैसे हम किसी काम को करने का बीड़ा उठाते हैं वैसे-वैसे हममें और शक्ति भरती जाती है ! हम स्वयं ही अपनी शक्ति पर संदेह करते हैं और फिर आत्मग्लानि से भर जाते हैं. वास्तव में सारे गुण हमारे भीतर ही हैं, यह मानकर चलना है. अवगुण तो एक आवरण की तरह ऊपर-ऊपर ही हैं. यदि हम शरण में जाते हैं तो ईश्वर की पवित्रता हमारे सारे दोषों को दूर करने में सहायक होती है. वह पावन है और उसकी निकटता में हम भी पावन हो जाते हैं. जो शक्ति उससे मिलती है वह सृष्टि के हित में लगने लगती है, क्योंकि हम स्वयं तो तृप्त हो जाते हैं, जो एक बार सच्चे हृदय से शरण में गया वह तृप्त ही है !