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Friday, October 7, 2011

वह पूर्ण है


ज्ञान वहीं टिकता है जहाँ वैराग्य है. मैं कुछ हूँ तो मेरा भी कुछ होगा, यदि मैं कुछ नहीं तो मेरा भी कुछ नहीं, फिर कैसा बंधन और कैसी मुक्ति? सदगुरु कामना शून्य है, अहंकार शून्य है जो स्वयं भी वैसा हो जाता है वही ईश्वर को पा सकता है. जैसे हवा है और धूप है वैसे ही ईश्वर हमारे चारों ओर मौजूद है पर कुछ होने का भाव ही उससे दूरी बना देता है. उसे एकछत्र अधिकार चाहिए. मन यदि पूरा उसे नहीं सौंपा तो वह कुबूल नहीं करता. गुरु नानक ने कहा है पूरा प्रभु आराधिए, पूरा जाका नाम, पूरा पूरे से मिले, पूरे के गुन गाम !  

Sunday, July 31, 2011

पूजा


जुलाई २००१ 
गुरुनानकदेवजी ने कहा है कि यह विशाल गगन ही उस परमेश्वर की आरती का थाल है, सूर्य, चन्द्र, तारे उसमें जलते हुए दीपक हैं, हवा फूलों और वनस्पतियों रूपी धूप की सुगंध फैला रही है और चंवर डुला रही है ... ऐसे विराट स्वरूप को क्या हम मन्दिरों में कैद कर सकते हैं...मंदिर हम जाते हैं ताकि उसकी याद आ सके, लेकिन वहाँ की पवित्रता भी यदि भीतर कोई परिवर्तन नहीं ला रही, तो भाव शून्य होकर पूजा करना समय व शक्ति का पूरा-पूरा उपयोग नहीं कहा जा सकता. हमारे भीतर पूर्ण जीवन की सम्भावनाएं छिपी हुई हैं, सृजन, सुख और आनंद के स्रोत हैं जो हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं. भीतर के मंदिर के द्वार खुलें यही बाहर के मंदिर की सार्थकता है.