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Friday, November 16, 2012

उत्सव कुछ तो कहना चाहे


दीवाली के दीपक अमावस की रात को पूर्णिमा में बदल देते हैं. हमारे भीतर भी अभी अमावस है, और दीपक जलाने हैं, मन की गहराई में प्रकाश ही प्रकाश है वहीं से इन दीपों के लिए ज्योति मिलेगी पर श्रद्धा का तेल पहले विश्वास के दीपक में हमें ही भरना होगा, तब आत्मा की ज्योति उन्हें सहज ही प्रज्ज्वलित कर देगी. फिर तो प्रकाश का महासागर ही नजर आता है. हमारे भीतर भी पूजा घट रही है, नगाड़े बज रहे हैं, मन मंदिर के द्वार अभी बंद हैं, लेकिन रह रह कर दूर से कोई कृष्ण अपनी बांसुरी की धुन सुनाये ही जाता है, भीतर रस का घट है, अमृत कुम्भ! जो विष के डर से कभी निकाला ही नहीं जाता, उत्सव याद दिलाते हैं कि मिष्ठान का जो रस बाहर से लेकर तृप्ति का अनुभव हम करते हैं वह रस भीतर भी मिल सकता है.  

Friday, August 10, 2012

मन जब मंदिर बन जाता है


जुलाई २००३ 
ईश्वर के सम्मुख हमें छोटे बालक की भांति आना है, जैसे माँ-पिता अपने बच्चे की भूल उसका पछतावा देखकर क्षमा कर देते हैं वैसे ही प्रभु हमारी भूलों को क्षमा करते हैं और तत्क्षण हमें उसे स्वीकार करना है, स्वयं को उत्तेजित, उतावला, कायर, भयभीत न बनाते हुए हम ईश्वर के साथ शांतिपूर्वक रह सकते हैं. हमारी भीतरी शांति हमें किसी भी परिस्थिति का सामना करने की क्षमता प्रदान करती है. भीतरी शांति ही बाहरी शांति की पूरक है. ईश्वर हमें अपने समान सृजित करते हैं, उनका स्वभाव पूर्ण शांतिमय तथा आनन्दमय है, वही आनंद तथा शांति हमारा भी मूल स्वभाव है, पर हम उसे भूले रहते हैं. सुख के लिये संसार की गुलामी करते हैं. वास्तव में तन साधना के लिये ही मिला है, यह आनंद का घर है, पर हम इसे खंडहर की तरह बना लेते हैं, जो घने जंगल में है जहाँ जाले लगे हैं, कीट-पतंगों ने जिस पर अपना अधिकार बना लिया है, जहाँ एक खंडित मूर्ति है पर कोई उसकी देखभाल नहीं करता, यदि हम इसे प्रभु का मंदिर बना कर रखें तो उसका राज्य हमें अपने भीतर मिल जाता है, हम उसके सखा बन जाते हैं, वह जो हमारे मित्र हैं पर बिछड़ गए हैं.

Sunday, July 31, 2011

पूजा


जुलाई २००१ 
गुरुनानकदेवजी ने कहा है कि यह विशाल गगन ही उस परमेश्वर की आरती का थाल है, सूर्य, चन्द्र, तारे उसमें जलते हुए दीपक हैं, हवा फूलों और वनस्पतियों रूपी धूप की सुगंध फैला रही है और चंवर डुला रही है ... ऐसे विराट स्वरूप को क्या हम मन्दिरों में कैद कर सकते हैं...मंदिर हम जाते हैं ताकि उसकी याद आ सके, लेकिन वहाँ की पवित्रता भी यदि भीतर कोई परिवर्तन नहीं ला रही, तो भाव शून्य होकर पूजा करना समय व शक्ति का पूरा-पूरा उपयोग नहीं कहा जा सकता. हमारे भीतर पूर्ण जीवन की सम्भावनाएं छिपी हुई हैं, सृजन, सुख और आनंद के स्रोत हैं जो हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं. भीतर के मंदिर के द्वार खुलें यही बाहर के मंदिर की सार्थकता है.