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Sunday, April 29, 2018

बुद्धम शरणम गच्छामि !


३० अप्रिल २०१८ 
आज बुद्ध पूर्णिमा है. आज ही के दिन राजकुमार सिद्धार्थ, परिव्राजक से बुद्ध बने थे. बुद्ध की अपरिमित करुणा के बारे में बचपन से कितनी ही कहानियाँ हम सुनते आये हैं. उन जैसा करुणानिधि परमात्मा के अतिरिक्त दूजा कौन हो सकता है, इसीलिए उन्हें विष्णु का एक अवतार घोषित किया गया है. जीव मात्र के प्रति प्रेम सिखाने वाले बुद्ध पूर्ण चन्द्रमा के समान सृष्टि के पटल पर सुशोभित हैं. उन्होंने ध्यान की जिस विधि का प्रसार किया उसे ही विपश्यना कहते हैं. जिसमें शरीर को स्थिर रखकर श्वास को देखने मात्र से मन ठहर जाता है, बुद्धि प्रखर हो जाती है और कुसंस्कार मिटने लगते हैं. विपश्यना का नियमित अभ्यास करने से एक दिन मन अपनी गहराई में जाकर उस शांति का अनुभव करता है जो उस क्षण तक विचारों के बादलों से ढकी हुई थी. मन की गहराई में ही शांति, करुणा और प्रेम के मोती हैं, जिन्हें स्वयं में पाकर ही मानव जगत में लुटा सकता है.


Friday, November 16, 2012

उत्सव कुछ तो कहना चाहे


दीवाली के दीपक अमावस की रात को पूर्णिमा में बदल देते हैं. हमारे भीतर भी अभी अमावस है, और दीपक जलाने हैं, मन की गहराई में प्रकाश ही प्रकाश है वहीं से इन दीपों के लिए ज्योति मिलेगी पर श्रद्धा का तेल पहले विश्वास के दीपक में हमें ही भरना होगा, तब आत्मा की ज्योति उन्हें सहज ही प्रज्ज्वलित कर देगी. फिर तो प्रकाश का महासागर ही नजर आता है. हमारे भीतर भी पूजा घट रही है, नगाड़े बज रहे हैं, मन मंदिर के द्वार अभी बंद हैं, लेकिन रह रह कर दूर से कोई कृष्ण अपनी बांसुरी की धुन सुनाये ही जाता है, भीतर रस का घट है, अमृत कुम्भ! जो विष के डर से कभी निकाला ही नहीं जाता, उत्सव याद दिलाते हैं कि मिष्ठान का जो रस बाहर से लेकर तृप्ति का अनुभव हम करते हैं वह रस भीतर भी मिल सकता है.  

Wednesday, November 9, 2011

समर्पण


जून २००२ 

आज पूर्णिमा है. हमारे हृदय गगन में भी परमात्मा रूपी चन्द्रमा का आगमन हो ऐसी कामना करनी चाहिए. मन शांत हो, ध्यानस्थ हो, परमात्मा की छवि हटे नहीं. सुमिरन अपने आप चलता रहे. सत्य को छोडकर कोई विचार मन में न टिके. एक उसी की याद हर वक्त बनी रहे और तब एक ऐसी गहराई का अनुभव होता है जैसे सब कुछ ठहर गया हो. सारा जगत स्थिर हो मन की तरह, कहीं कोई उहापोह नहीं विक्षेप नहीं. अद्भुत है वर्तमान का यह क्षण. हमारे और उसके बीच अभिमान का झीना सा पर्दा ही तो है, इसे हटा दें तो ही पूर्ण समर्पण संभव है.