जनवरी २००५
हम भगवान को तो मानते हैं पर भगवान ‘की’
नहीं मानते, यदि हम key को भी अपना लें तो जीवन की कई गुत्थियाँ सुलझ जाती हैं. हम
जितना-जितना बाहर सुख खोजते हैं, उतना उतना सत्य से दूर होते जाते हैं. तब मानव
अपने स्वार्थ के लिए वस्तुओं को ही नहीं व्रतों, नियमों यहाँ तक की नीतियों में भी
परिवर्तन कर लेते हैं. क्षणिक सुख के पीछे लालायित होकर अपने को नीचे गिराने में
भी आज कोई शर्म की बात नहीं समझता. लोग रिश्वत लेने को तो फिर भी बुरा मानते हैं
पर रिश्वत देने को नहीं. आज भ्रष्ट आचरण को सामान्य जीवन का अंग मान लिया गया है,
क्योंकि समाज के उच्च कहे जाने लोग ही इसे अपनाते हैं. अपनी इच्छा को ही सर्वोपरि मानने वाला समाज नीति, कानून तथा धर्म की परवाह
करना ही छोड़ देता है.