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Wednesday, October 19, 2022

जगमग दीप जले

जब भीतर-बाहर, घर, द्वार, बाज़ार, दफ़्तर सभी जगह स्वच्छता का आयोजन सहज ही होने लगता है तब मानना चाहिए कि दिवाली आने वाली है।दीपावली का पर्व अनेक अर्थों को अपने भीतर धारण किए हुए है। यह राम से संयुक्त है तो कृष्ण से भी, इसमें यम की कथा भी आती है और धन्वन्तरि की भी। दिवाली लक्ष्मी से जुड़ी है तो काली से भी। जीवन में राम का आगमन हो तो अज्ञान का अंधकार दूर हो जाता है और ज्ञान, हर मार्ग को प्रकाशित करता हुआ आगे ले जाता है। इस आनंद को अकेले नहीं सबके साथ मिलकर अनुभव करना है, इसलिए इसमें एक-दूसरे को मिष्ठान व उपहार वितरित करते हैं। गोवर्धन पूजा का संदेश है प्रकृति का आराधन। माटी का एक छोटा सा जलता हुआ दीपक दूर से आकर्षित कर लेता है, फिर आज के दिन तो लाखों दीपक जलाए जाते हैं। मानव तन भी माटी से बना है, जिसमें चेतना की बाती जल रही है, जो स्नेह से प्रदीप्त रहती है। भीतर चैतन्य का दीपक जलता हो तो अंतर में उल्लास कम नहीं होता और सहज ही सब ओर बहने लगता है। सृष्टि में प्रकृति के साथ आदान-प्रदान आरम्भ हो जाता है। 


Friday, March 21, 2014

भीतर कोई राग छिपा है

अक्तूबर २००५ 
यदि हम सहज रहना चाहते हैं तो हमें वस्तुओं को वैसे ही देखना सीखना होगा, जैसी वे हैं. हम अपनी धारणाओं को उन पर आरोपित कर देते हैं और व्यर्थ ही भ्रमित होते रहते हैं. आत्मा अविनाशी है सदा है पर हम ने उसे मृत्यु के साथ जोड़ दिया है शरीर किसी भी क्षण जा सकता है पर हम ऐसे जिए चले जाते हैं जैसे सदियों तक जीना है. आत्मा की कीमत पर हम देह को सजाते हैं पर बिन प्रकाश के दीपक जैसा सूना होता है आत्मा जगे बिना हम भी खाली ही रह जाते हैं. सद्गुरु के बताये मार्ग से जब शरणागति हमारा स्वभाव बन जाती है तब जीवन में एक स्थिरता आती है, निश्चिंतता आती है, सहजता आती है, समता आती है और तब भीतर संगीत भर जाता है. जगत की असत्यता का अनुभव होने लगता है और परमात्मा कण-कण में प्रकट होने लगता है.


Sunday, April 15, 2012

आनंद हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है


फरवरी २००३
आत्मा का ज्ञान हमारे भीतर के कुसंस्कारों को उसी तरह जला कर समाप्त कर देता है जैसे कोई चिंगारी सूखी घास को. न जाने कब से हम कुछ खोज रहे हैं, अब हृदय में ज्ञान की प्यास जगी है, ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति फलित हुई है. ज्ञान के दीपक के प्रकाश में बैठने का अवसर मिला है. मन को भी तो विश्राम चाहिए, मन की दौड़ जहाँ खत्म होती है वहीं से आध्यात्मिक लोक की शुरुआत होती है. जो हमारा वास्तविक घर है क्योंकि हम न देह हैं न मन, ये तो हमें प्रकृति द्वारा प्राप्त उपकरण हैं. हमारा वास्तविक रूप बुद्धि व अहंकार से परे एक आनंदमय सत्ता है, जो उस चिन्मय परमात्मा का अंश है. परमात्मा इस सृष्टि का कारण है, हमारा हितैषी है, सुह्रद है. जब तक हम देहात्म भाव से मुक्त नहीं हो पाते तो इस आनंद से वंचित रहते हैं जो हमारा अधिकार है. आत्मस्वरूप में टिकते ही अंतर में प्रेम का अनवरत प्रवाह होता है, तृप्ति का अनुभव होता है,विचारों के प्रति सजगता बढ़ती है सरलता और सहजता हमारा स्वभाव बन जाता है.