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Monday, October 3, 2022

विजयदशमी की शुभकामनाएँ

दशहरा अर्थात दशानन का मरण, या दस सिर वाले असुर का विनाश। देवता और असुर दोनों ही कहाँ रहते हैं ? हमारे ही  मन में उनका निवास है, क्योंकि जो ब्रह्मांड में है, वही पिंड में है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया, मद, मत्सर, दर्प, ईर्ष्या तथा अहंकार रूपी रावण के दस सिरों को भगवती दुर्गा की प्रार्थना के बाद ग्रहण की गयी शक्ति के कारण राम रूपी आत्मा नष्ट करती है। मन जब हनुमान की तरह समर्पित होता है और ध्यान  लक्ष्मण की तरह सेवा में तत्पर होता है, तब सीता रूपी बुद्धि को उपरोक्त दस विकारों की क़ैद से मुक्ति प्राप्त होती है। भारत भूमि पर मनाए जाने वाले हर उत्सव का एकमात्र उद्देश्य आत्मा को शक्तिशाली बनाना है ताकि वह प्रकृति के पार जा सके और अपनी दिव्यता को अनुभव करे। 


Wednesday, July 16, 2014

जाने कब उससे मिलना हो

सितम्बर २००६ 
संतों की वाणी हमें झकझोर देती है. हमारे भीतर की सुप्त चेतना जो कभी-कभी करवट ले लेती है, एक दिन तो पूरी तरह से जागेगी. हम कब तक यूँ पिसे-पिसे से जीते रहेंगे, कब तक अहंकार का रावण हमें भीतर के राम से विलग रखेगा. हमारे जीवन में विजयादशमी कब घटेगी. वे कहते हैं, हम जगें, प्रेम से भरें, आनन्द से महकें. हम जो राजा के पुत्र होते हुए कंगालों का सा जीवन बिता रहे हैं. सूरज बनना है तो जलना भी सीखना पड़ेगा. अब और देर नहीं, न जाने कब जीवन की शाम आ जाये, कब वह घड़ी आ जाये जब उससे मिलना हो, तब हम उसे क्या मुँह दिखायेंगे? ऐसा कहकर सन्त हमें बार-बार चेताते हैं.