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Wednesday, July 16, 2014

जाने कब उससे मिलना हो

सितम्बर २००६ 
संतों की वाणी हमें झकझोर देती है. हमारे भीतर की सुप्त चेतना जो कभी-कभी करवट ले लेती है, एक दिन तो पूरी तरह से जागेगी. हम कब तक यूँ पिसे-पिसे से जीते रहेंगे, कब तक अहंकार का रावण हमें भीतर के राम से विलग रखेगा. हमारे जीवन में विजयादशमी कब घटेगी. वे कहते हैं, हम जगें, प्रेम से भरें, आनन्द से महकें. हम जो राजा के पुत्र होते हुए कंगालों का सा जीवन बिता रहे हैं. सूरज बनना है तो जलना भी सीखना पड़ेगा. अब और देर नहीं, न जाने कब जीवन की शाम आ जाये, कब वह घड़ी आ जाये जब उससे मिलना हो, तब हम उसे क्या मुँह दिखायेंगे? ऐसा कहकर सन्त हमें बार-बार चेताते हैं.  

Monday, August 29, 2011

आत्मा और मन


नवम्बर २००१ 
एक बार एक निर्धन व्यक्ति उसी पथ से लौट रहा था जहां से राजा भी गुजर रहा था. लोग उसे झुक- झुक कर सलाम करते तो इसे भ्रम होता कि मुझे ही तो नहीं कर रहे हैं. वैसे ही हमारा मन है, थोड़ी सी प्रशंसा होती है तो उसे लगता है उसने बड़ा तीर मार लिया, कोई प्रेम देता है तो वह स्वयं को बहुत योग्य समझ कर फूल जाता है... जानता नहीं वह तो आत्मा का उपकरण मात्र है जैसे कोई किसी बड़े आदमी का सेक्रेट्री हो तो वह भी खुद को महत्वपूर्ण मानने लगता है. आत्मा क्योंकि अपने आप में पूर्ण है उसे न प्रशंसा की भूख है न प्रेम की, वह ध्यान भी नहीं देता इन बातों पर. जैसे कोई राजा छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं देता. बेचारा मन ख्वाहम्खाह मारा जाता है. अब हम पर निर्भर है कि हम दोनों में खुद को क्या मानते हैं.