अतीत हमारे वर्तमान में सेंध न लगाए, इसका सदा ध्यान रखना है। परमात्मा जब भी जिसको मिला है, सदा वर्तमान में मिला है। जब हमारा मन अतीत या भविष्य की कल्पना में खोया होता है, वह उस वर्तमान की क़ीमत पर करता है, जो हमें लक्ष्य तक पहुँचा सकता था। साधक का एकमात्र लक्ष्य है अपने भीतर छिपे दिव्य तत्व का आत्मा के रूप में अनुभव करना तथा कण-कण में छिपे देवत्व को पहचान कर जगत के साथ एकत्व का अनुभव करना। हमारा मन इस एकत्व को अनुभव नहीं कर सकता क्योंकि वह सीमित है। मन हमारे विचारों, भावनाओं, आकांक्षाओं का एक पुंज है, बुद्धि अवश्य तर्क के आधार पर जगत की अनंतता को जान सकती है। किंतु बौद्धिक स्तर पर जानने से उस दिव्यता की कल्पना ही की जा सकती है, उसे अस्तित्त्व गत जानना होता है। जिसका अर्थ है, हमारी हर श्वास में वह प्रकट हो, हमारे हर कृत्य, हर विचार में उसकी झलक हो, जो सदा आनन्दमय है, पूर्ण है, प्रेम, शांति, शक्ति और ज्ञान का स्रोत है। जीवन में जब भी इन तत्वों की कमी हो मानना होगा कि हम आत्मा से दूर हैं और अपने लक्ष्य से भी दूर हो रहे हैं।
Thursday, November 24, 2022
Tuesday, August 23, 2022
इस पल में जो जाग गया
Wednesday, November 24, 2021
वर्तमान में ठहरे मन जब
यदि आत्मा को हम सूर्य समान कहते हैं तो मन की उपमा चंद्रमा से दी जाती है। सूर्य निज प्रकाश से स्वयं को प्रकाशित करता है पर चाँद सूर्य के प्रकाश को ही परावर्तित करता है। आत्मा चैतन्य है, पर मन परावर्तित चेतना से प्रकाशित होता है।यदि मन पर विचारों के घने बादल छाए हों तो चेतना घट जाएगी, मन अति चंचल हो तो चेतना बिखर जाएगी। जब हम नींद में होते हैं तब चेतन मन सो जाता है, हमें अपना भान ही नहीं रहता, नींद में राजा और रंक एक समान हो जाते हैं। जागते हुए भी हम कितनी बार दिवास्वप्न में खो जाते हैं, विचार हमें कहीं से कहीं ले जाते हैं, तब हम स्वयं को भूल ही जाते हैं। जब कोई समान रखकर बाद में याद न आए तो समझना होगा कि उसे रखते समय मन कहीं घूमने गया था। इसीलिए ध्यान का इतना महत्व है, ध्यान में हम सीखते हैं कि मन को कैसे वर्तमान में रखा जाए, तब आत्मा का पूरा प्रकाश मन से झलकेगा और हम अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित हो पाएँगे।
Sunday, April 18, 2021
'है' को जो मन स्वीकार करे
जो ‘है’ उस हम चाहते नहीं. क्योंकि वह है ही, जो ‘नहीं’ है उसे हम चाहते हैं और वह चाह हमें अशुद्ध करती है। कोई भी इच्छा हमें अपने स्वरूप से नीचे लाती है। तो क्या हम इच्छा करना ही छोड़ दें, नहीं, यदि छोड़ना ही है तो देहाभिमान को छोड़ना होगा। हर इच्छा देह से आरंभ होती है। जीव भाव छोड़ना होगा, यश की इच्छा जीव से जुड़ी होती है। अहंकार को छोड़ना होगा, कर्ता भाव अहंकार से जुड़ा है। मोक्ष कुछ करके हासिल नहीं किया जा सकता। यह एक भावदशा का नाम है, ऐसी भाव दशा का, जिसमें मन पूर्णत: रिक्त होता है, भूत या भविष्य का कोई विचार उसे प्रभावित नहीं करता, कोई चाह उसे अशुद्ध नहीं करती। मन जो निपट वर्तमान में है और स्वयं के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता, वह मुक्त ही है।
Friday, August 28, 2020
मध्य में टिकना जो भी जाने
ज्ञानीजन कहते हैं, सदा वर्तमान में रहो. अतीत जा चुका और भविष्य अभी आया नहीं है, फिर क्यों अपनी ऊर्जा को उन बातों को याद करने में गंवाए जो हमारे वर्तमान जीवन को सुंदर बनाने में जरा भी काम नहीं आ सकतीं. अतीत से हमें सीख अवश्य लेनी है और वह हमारा मन उसी वक्त ग्रहण कर लेता है जब वह घटना विशेष घटी थी. इस समय का एक-एक पल हमारे भविष्य को गढ़ने वाला है और यही हमारे हाथ में है. विपासना ध्यान में जब हम श्वास को देखते हैं तो जाती हुई श्वास अतीत बन गयी, अगली अभी आयी नहीं है उस मध्य काल में यही कोई पल भर के लिए भी टिक जाता है तो उसकी बाहर जाने वाली श्वास सहज और शांत हो जाती है. ऐसे ही आज का दिन बीत गया, मध्य में रात्रि है यदि वह पूर्ण विश्राम देती है तो अगले दिन हम प्रफ्फुलित रह सकते हैं. इसी तरह वार्तालाप में यदि एक व्यक्ति ने अपनी बात कह दी और हम पल भर के लिए रुक गए तो उसका जवाब सही और स्थिरता के साथ दे पाएंगे. यदि हम उसकी बात में ही अटक गए या पहले ही अपना जवाब तय कर लिया तो हमारा उत्तर सन्तुलित नहीं हो सकता. भगवान बुद्ध का मध्यम मार्ग भी यही सिखाता है कि हमें मध्य में ठहरने की कला सीखनी है.
Tuesday, July 21, 2020
दृष्टि मिले जब हमें ध्यान की
Tuesday, June 23, 2020
बहे ऊर्जा पल-पल उसकी
Friday, January 17, 2020
सत्य समान तप नहीं दूजा
Tuesday, July 16, 2019
सदा वसंत रहे जब मन में
Thursday, July 11, 2019
इस पल में जो जाग गया
Saturday, June 1, 2019
चाहें तो इस पल में जी लें
Sunday, August 19, 2018
पल-पल सजग रहेंं जीवन में
Monday, February 19, 2018
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा
Saturday, September 9, 2017
मिटना जिसने सीख लिया है
Sunday, July 23, 2017
इस क्षण में ही मिल सकता वह
Thursday, March 23, 2017
नव जीवन पल पल मिलता है
जिन्दगी कैद है दो कल में, आज को दो पल मयस्सर नहीं होते