Showing posts with label वर्तमान. Show all posts
Showing posts with label वर्तमान. Show all posts

Thursday, November 24, 2022

श्वास श्वास जब खिल जाएगी

अतीत हमारे वर्तमान में सेंध न लगाए, इसका सदा ध्यान रखना है। परमात्मा जब भी जिसको मिला है, सदा वर्तमान में मिला है। जब हमारा मन अतीत या भविष्य की कल्पना में खोया होता है, वह उस वर्तमान की क़ीमत पर करता है, जो हमें लक्ष्य तक पहुँचा सकता था। साधक का एकमात्र लक्ष्य है अपने भीतर छिपे दिव्य तत्व का आत्मा के रूप में अनुभव करना तथा कण-कण में छिपे देवत्व को पहचान कर जगत के साथ एकत्व का अनुभव करना। हमारा मन इस एकत्व को अनुभव नहीं कर सकता क्योंकि वह सीमित है। मन हमारे विचारों, भावनाओं, आकांक्षाओं का एक पुंज है, बुद्धि अवश्य तर्क के आधार पर जगत की अनंतता को जान सकती है। किंतु बौद्धिक स्तर पर जानने से उस दिव्यता की कल्पना ही की  जा सकती है, उसे अस्तित्त्व गत जानना होता है। जिसका अर्थ है, हमारी हर श्वास में वह प्रकट हो, हमारे हर कृत्य, हर विचार में उसकी झलक हो, जो सदा आनन्दमय है, पूर्ण है, प्रेम, शांति, शक्ति और ज्ञान का स्रोत है। जीवन में जब भी इन तत्वों की कमी हो मानना होगा कि हम आत्मा से दूर हैं और अपने लक्ष्य से भी दूर हो रहे हैं। 


Tuesday, August 23, 2022

इस पल में जो जाग गया

 जीवन का हर नया पल एक उपहार की तरह हमें मिलता है. हम पुराने उपहार की मीनमेख निकालने में लगे रहते हैं या तो अब न जाने कौन सा उपहार मिलेगा इसकी  चिंता में इस पल के उपहार को खोलना ही भूल जाते हैं. इस तरह वर्तमान सदा ही अतीत के पश्चाताप या भविष्य के भय का शिकार बनता रहता है. जो भी खुशी है वह इस क्षण में मिलती है, सुख की हर स्मृति बीते कल की छाया है. भविष्य की कल्पना कितनी भी सुखद हो वह वास्तविक नहीं है. वह चित्र की नदी की तरह प्यास नहीं बुझाती. शुद्ध, निर्दोष, वास्तविक सुख केवल वर्तमान में बिना किसी कीमत के सहज ही बंट रहा है, जिसकी सबको तलाश है. खेल, खतरे भरे कार्यो में, प्रेम में हम वर्तमान में होते हैं, तभी ख़ुशी का अनुभव होता है. केवल ध्यानी व्यक्ति सदा ही वर्तमान में रह सकता है. 

Wednesday, November 24, 2021

वर्तमान में ठहरे मन जब

यदि आत्मा को हम सूर्य समान कहते हैं तो मन की उपमा चंद्रमा से दी जाती है। सूर्य निज प्रकाश से स्वयं को प्रकाशित करता है पर चाँद सूर्य के प्रकाश को ही परावर्तित करता है। आत्मा चैतन्य है, पर मन परावर्तित चेतना से प्रकाशित होता है।यदि मन पर विचारों के घने बादल छाए हों तो चेतना घट जाएगी, मन अति चंचल हो तो चेतना बिखर जाएगी। जब हम नींद में होते हैं तब चेतन मन सो जाता है, हमें अपना भान ही नहीं रहता, नींद में राजा और रंक एक समान हो जाते हैं। जागते हुए भी हम कितनी बार दिवास्वप्न में खो जाते हैं, विचार हमें कहीं से कहीं ले जाते हैं, तब हम स्वयं को भूल ही जाते हैं। जब कोई समान रखकर बाद में याद न आए तो समझना  होगा कि उसे रखते समय मन कहीं घूमने गया था। इसीलिए ध्यान का इतना महत्व है, ध्यान में हम सीखते हैं कि मन को कैसे वर्तमान में रखा जाए, तब आत्मा का पूरा प्रकाश मन से झलकेगा और हम अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित हो पाएँगे। 


Sunday, April 18, 2021

'है' को जो मन स्वीकार करे

 जो ‘है’ उस हम चाहते नहीं. क्योंकि वह है ही, जो ‘नहीं’ है उसे हम चाहते हैं और वह चाह हमें अशुद्ध करती है। कोई भी इच्छा हमें अपने स्वरूप से नीचे लाती है। तो क्या हम इच्छा करना ही छोड़ दें, नहीं, यदि छोड़ना ही है तो देहाभिमान को छोड़ना होगा। हर इच्छा देह से आरंभ होती है। जीव भाव छोड़ना होगा, यश की इच्छा जीव से जुड़ी होती है। अहंकार को छोड़ना होगा, कर्ता भाव अहंकार से जुड़ा है। मोक्ष कुछ करके हासिल नहीं किया जा सकता। यह एक भावदशा का नाम है, ऐसी भाव दशा का, जिसमें मन पूर्णत: रिक्त होता है, भूत या भविष्य का कोई विचार उसे प्रभावित नहीं करता, कोई चाह उसे अशुद्ध नहीं करती। मन जो निपट वर्तमान में है और स्वयं के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता, वह मुक्त ही है।  


Friday, August 28, 2020

मध्य में टिकना जो भी जाने

 ज्ञानीजन कहते हैं, सदा वर्तमान में रहो. अतीत जा चुका और भविष्य अभी आया नहीं है, फिर क्यों अपनी ऊर्जा को  उन बातों को याद करने में गंवाए जो हमारे वर्तमान जीवन को सुंदर बनाने में जरा भी काम नहीं आ सकतीं. अतीत से हमें सीख अवश्य लेनी है और वह हमारा मन उसी वक्त ग्रहण कर लेता है जब वह घटना विशेष घटी थी. इस समय का एक-एक पल हमारे भविष्य को गढ़ने वाला है और यही हमारे हाथ में है. विपासना ध्यान में जब हम श्वास को देखते हैं तो जाती हुई श्वास अतीत बन गयी, अगली अभी आयी नहीं है उस मध्य काल में यही कोई पल भर के लिए भी टिक जाता है तो उसकी बाहर जाने वाली श्वास सहज और शांत हो जाती है. ऐसे ही आज का दिन बीत गया, मध्य में रात्रि है यदि वह पूर्ण विश्राम देती है तो अगले दिन हम प्रफ्फुलित रह सकते हैं. इसी तरह वार्तालाप में यदि एक व्यक्ति ने अपनी बात कह दी और हम पल भर के लिए रुक गए तो उसका जवाब सही और स्थिरता के साथ दे पाएंगे. यदि हम उसकी बात में ही अटक गए या पहले ही अपना जवाब तय कर लिया तो हमारा उत्तर सन्तुलित नहीं हो सकता. भगवान बुद्ध का मध्यम मार्ग भी यही सिखाता है कि हमें मध्य में ठहरने की कला सीखनी है. 


Tuesday, July 21, 2020

दृष्टि मिले जब हमें ध्यान की


किसी भी वस्तु को ठीक से देखने के लिए एक समुचित दूरी पर रखना होता है. आँख के बहुत नजदीक रखी वस्तु भी नजर नहीं आती और बहुत दूर रखी वस्तु भी. जीवन भी कुछ ऐसा ही है जब हम उसमें इतना घुस जाते हैं तब चीजें धुंधली होने लगती हैं और जब उससे दूर निकल जाते हैं तब वह हमारे हाथ से फिसलता हुआ नजर आता है. कभी अतीत के स्वप्न हमें वर्तमान से दूर ले जाते हैं तो कभी भविष्य की व्यर्थ आशंका हमारी ऊर्जा को बहा ले जाती है. ध्यान ही हमारे भीतर वह दृष्टि पैदा करता है जिससे जीवन जैसा है वैसा नजर आता है. वर्तमान के क्षण में जब मन टिकना सीख जाता है तभी वह अस्तित्त्व से प्राप्त अपार क्षमता को देख पाता है. यह ऐसा ही है जैसे कोई आँखें बंद करके कमरे से बाहर निकलने का प्रयास करे और दरवाजे के निकट आते ही अपना मुख मोड़ ले और विपरीत दिशा में चलने लगे. यदि ऐसा हर बार होने लगे तो वह यह निर्णय कर लेगा इस कमरे में दरवाजा है ही नहीं. ऐसा व्यक्ति जीवन के मर्म से वंचित ही रह जाता है. 

Tuesday, June 23, 2020

बहे ऊर्जा पल-पल उसकी

जीवन अपार संभावनाएं लिए हमारे सम्मुख खड़ा है. हम ही उससे आँखें चुराए अपने आपको एक बंधे-बंधाये क्रम में ढाल कर अपनी ऊर्जा को व्यक्त होने से रोकते हैं. परमात्मा की ऊर्जा भिन्न-भिन्न आकारों से पल-पल व्यक्त हो रही है. कोई कलाकार एक अनगढ़ पत्थर को सुंदर शिल्प में बदल देता है, कोई सात सुरों से ऐसी मोहक धुन निकालता है कि जड़-चेतन सभी उसे सुनकर ठिठक जाते हैं. कहीं वह परमात्मा वीरों के रूप में प्रकट हो रहा है तो कहीं संतों के रूप में. अनेकानेक फूलों, पंछियों और तितलियों के रूप में भी तो वही ऊर्जा व्यक्त हो रही है. इस ऊर्जा का स्वभाव है प्रेम और आनंद ! ध्यान की गहराई में इसका अनुभव होता है और सेवा के रूप में जगत में यह प्रकट होती है. उन कर्मों से यह प्रकट होती है जो जगत के प्रति प्रेम से प्रकटे हों या आनंद के अतिरेक में सहज ही होते हों. मन जब इतर कामनाओं से खाली हो, तब इस ऊर्जा का अनुभव कण-कण में उसे होता है. शास्त्र इसे ही भक्ति कहते हैं. भक्त का अंतर जब इस भक्ति का स्वाद ले लेता है तो जगत के अन्य स्वाद उसे नहीं भाते. जीवन में उसे कुछ पाने का नहीं सहज होकर जीने का मार्ग भाता है. भविष्य की कल्पनाएं और अतीत की उपाधियों से परे वह केवल वर्तमान में ही रहने लगता है. 

Friday, January 17, 2020

सत्य समान तप नहीं दूजा



आज के बदलते हुए दौर में आरम्भ से ही बच्चों को योग और ध्यान से परिचित कराना आवश्यक बन गया है. बच्चों को सत्य आसानी से अनुभव में आता है क्योंकि उनके पास अहंकार की कोई बाधा नहीं होती, न ही वे हर बात को बुद्धि से तोलते हैं. वे सीधे हृदय से ही अनुभव करते हैं. बुद्ध कहते हैं, जीवन में सभी कुछ परस्पर निर्भर है और नश्वर है. प्रकृति निरन्तर परिवर्तित हो रही है. ध्यान की गहराई में जब देह, मन, भावना, विचार सब कुछ स्पष्ट बदलते हुए दिखाई देते हैं तब उनके द्वारा प्रभावित होने का डर नहीं रहता. सत्य कभी बदलता नहीं और जगत एक सा रहता नहीं, इस बात को जब भीतर अनुभव कर लिया जाता है तो जीवन सरल हो जाता है, प्रेममय हो जाता है और सारा विषाद खो जाता है. वर्तमान में टिकना ही जागरण है. वर्तमान के क्षण में ही जीवन से मुलाकात हो सकती है. जैसे ही मन अतीत या भविष्य में जाता है, सत्य से नाता टूट जाता है. अतीत जा चूका, वह मिथ्या है, भविष्य अभी आया नहीं, केवल यही क्षण सत्य है. इस क्षण में पुरे होश के साथ जीना ही साधक का कर्त्तव्य है. ऊर्जा का सरंक्षण तभी सम्भव है.

Tuesday, July 16, 2019

सदा वसंत रहे जब मन में



एक जीवन है हम सबका जीवन, यानि सामान्य जीवन, जिसमें कभी ख़ुशी है कभी गम हैं. इस जीवन में जिन खुशियों को फूल समझकर हमने ही चुना था वे ही अपने पीछे गम के कांटे छुपाये हैं यह बात देर से पता चलती है. इस जीवन में छले जाने के अवसर हर कदम पर हैं, क्योंकि यहाँ असलियत को छुपाया जाता है, जो नहीं है उसे ही दिखाया जाता है. एक और जीवन है ज्ञानीजन का जीवन, जिसमें सदा वसंत ही है, जिसमें खुशियों के फूलों को चुनने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वे स्वयं ही फूल बन जाते हैं, ऐसे फूल जिनमें कोई कांटे नहीं होते. उस जीवन में कोई छल नहीं होता क्योंकि भीतर और बाहर वे एक से हैं. वे वास्तविकता को जान कर सहज रहना सीख जाते हैं, कोई दिखावा, दम्भ या पाखंड, बनावट उन्हें छू भी नहीं पाती. जीवन जैसा उन्हें मिलता है उसे वैसा ही स्वीकार करने की क्षमता वे अपने अंदर जगा लेते हैं. वे वर्तमान में रहते हैं और अतीत के भूत से पीछा छुड़ा लेते हैं. भविष्य के दिवास्वप्न भी उन्हें नहीं लुभाते क्योंकि जीवन की क्षण भंगुरता का उन्हें हर समय बोध रहता है, जिस कल के लिए हम संग्रह करते हैं, और वर्तमान में कष्ट उठाते हैं, उस कल को वे कल पर ही छोड़ देते हैं. वह कल भी उनके लिए इस वर्तमान की तरह सुंदर ही होगा ऐसा उन्हें यकीन रहता है. ऐसे ही जीवन से हमारा परिचय कराने के लिए परमात्मा ने गुरू और शास्त्र का निर्माण किया हैं.

Thursday, July 11, 2019

इस पल में जो जाग गया


जीवन की परिभाषाएं कितनी ही देते चलो, जीवन है कि चूकता ही नहीं, हाथ में आता ही नहीं. नित नये रंग बिखेरे चला जाता है. जीवन के रंग अनंत हैं और इसके ढंग भी अनंत हैं. इसे किसी खांचे में फिट नहीं किया जा सकता. यदि कोई सोचे कि विकासशील देश के किसी सुदूर गाँव में ही असली जीवन है तो वह भी आधा सच होगा और यदि कोई कहे विकसित देशों में ही सच्चा जीवन है तो वह भी अर्धसत्य होगा. जीवन के मर्म को जाने बिना हम कुछ भी करें, कहीं भी रहें एक तलाश भीतर चलती ही रहती है. यही माया है. सर्व सुविधा सम्पन्न होकर भी कुछ यहाँ अभाव का अनुभव करते हैं और कुछ न होते हुए भी अलमस्त देखे जाते हैं. इसका अर्थ हुआ जो भी जहाँ है वहाँ यदि थोड़ा गहराई से देखे कि जिस जीवन को ढूँढने में हम सारा श्रम लगा रहे हैं, वह तो एक दिन हाथ से फिसल जाने वाला है, और जो हमारे पास इस समय है वह अमूल्य है. वर्तमान के क्षण में जिसने जीवन से मुलाकात नहीं की वह भविष्य में कभी करेगा, ऐसी कल्पना दिवास्वप्न के सिवा कुछ भी नहीं.

Saturday, June 1, 2019

चाहें तो इस पल में जी लें



वर्तमान के लघु क्षण में विराट छिपा है, जिसने ध्यान के इस राज को जान लिया, वह मुक्त है. मन सदा अतीत में ले जाता है या भविष्य की कल्पना में. वर्तमान में आते ही मन मिट जाता है, उसे टिकने के लिए कोई न कोई आधार चाहिए. वर्तमान का पल इतना छोटा है कि उसमें कोई शब्द नहीं ठहर सकता. मन शब्द के सहारे ही जीवित रहता है. मौन का अनुभव वर्तमान का अनुभव है. अतीत में जाकर कभी मौन को अनुभव नहीं किया जा सकता. मौन ही सत्य का अनुभव है. यदि कोई इस क्षण में टिकना सीख ले तो वह ऊर्जा के परम स्रोत से जुड़ जाता है. ऊर्जा का यह स्रोत प्रेम, आनंद और शांति का संगम है.

Sunday, August 19, 2018

पल-पल सजग रहेंं जीवन में


२० अगस्त २०१८ 
जीवन हर क्षण एक सा है, एक रस, सदा जीवंत, सदा भरपूर, उस सागर की तरह जो सदा ही जल से छलकता रहता है, कभी खाली नहीं होता. हमारा पात्र कितना बड़ा है, और हम उससे क्या चाहते हैं, यह तय करता है, कि जीवन हमारे लिए कैसा है. हमें पल-पल इसे गढ़ना है, पल-पल इसे संवारना है. इसकी देने की क्षमता अपार है, पर हमारी चाह छोटी सी है. विशाल हृदय हो तभी कोई अटल जी की तरह विरोधियों के मध्य रहकर भी अपना नाम अमर कर जाता है. हर घड़ी एक अनंत को अपने भीतर छिपाए है, जैसे अति सूक्ष्म परमाणु में अपरिमित शक्ति है, बिलकुल वैसे ही. अपने सामान्य जीवन की आपाधापी में हम इस सत्य को भुला बैठते हैं, और उस अनंत से वंचित रह जाते हैं. मन सीमित से संतुष्ट नहीं होता, उसे विस्तृत हुए बिना चैन नहीं मिलता, तभी आकाश की अनंतता उसे लुभाती है. जीवन से नजर मिलनी है तो वर्तमान क्षण की गहराई में उतरना होगा और मन के प्रांगण को उसके लिए खाली कर देना होगा.

Monday, February 19, 2018

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा


२० फरवरी २०१८ 
जीवन हर पल नया है, एकदम ताजा, अछूता सा..हर घड़ी उसका स्पर्श मिले इसके लिए हमें भी हर क्षण का साक्षी होना होगा. उसी क्षण में उसे जानना होगा, हम वर्तमान को तब जीते हैं जब वह बीत जाता है, हम भविष्य को तब जीते हैं जब वह घटा भी नहीं होता. मन जिन बातों में हमें भरमाये रखता है, वे या तो बासी हो चुकी होती हैं, अथवा तो कल्पनाएँ मात्र ही होती हैं. परमात्मा उस नन्हे से पल में अपनी झलक दिखाता है, जिसमें हम उससे मिलने की कोई न कोई योजना बना रहे होते हैं. हम उसका नाम लेते हैं, ताकि हमारा जीवन वह भविष्य में खुशियों से भर दे, उसका नाम लेते समय यदि उससे मुलाकात नहीं हुई तो समझना चाहिए कि होगी ही नहीं. धरा इस क्षण में जैसी है, और गगन इस क्षण में जैसा है, वैसा अनंत युगों में नहीं हुआ, इस चमत्कार को जो खुली आंखों देख ले, वह कभी परमात्मा से विलग नहीं हो सकता.  

Saturday, September 9, 2017

मिटना जिसने सीख लिया है

९ सितम्बर २०१७ 
मन का स्वभाव है अभाव में जीना, आत्मा तृप्ति और संतोष चाहती है. मन की दृष्टि सदा कमियों की तरफ ही जाती है, आत्मा अपने आप में इतनी आनंदित होती है कि कमियां उसे नजर ही नहीं आतीं. मन को सदा नयेपन की तलाश है, आत्मा चिरंतन है. मन सदा भय में जीता है, आत्मा में होना ही अभय का दूसरा नाम है. मन मिटने से डरता है, आत्मा कुछ न होने में ही अपना होना जानती है. मन दुःख बनाता है, न हो तो आशंकित होता है, आत्मा किसी भी परिस्थिति में अडोल बनी रह सकती है. मन सदा अतीत अथवा भविष्य में जीता है, कभी अतीत की भूलों पर पछताता है और कभी भविष्य में होने वाले दुखों से घबराता है. आत्मा के लिए हर क्षण अपार सम्भावना लिए आता है. वर्तमान में रहना ही आत्मा में होना है. 

Sunday, July 23, 2017

इस क्षण में ही मिल सकता वह

२४ जुलाई २०१७ 
केवल वर्तमान का यह नन्हा सा पल ही सत्य है. यही क्षण अपने भीतर अनंत को छुपाये है. जैसे एक परमाणु में असीम शक्ति छिपी है वैसे ही एक क्षण में अनंत समय छिपा है. वर्तमान में रहने की कला ही ध्यान है. यदि कोई इस कला को सीख लेता है तो वह कभी समय की कमी महसूस नहीं करता. वास्तव में वर्तमान के सिवा कोई समय ही नहीं है, सब कुछ इसी क्षण में है और इसी वक्त है. अनंत काल जो बीत गया और अनंत काल जो आने वाला है, वह इसी क्षण में है अन्यथा नहीं है. जो आज अतीत बन गया है, वह तो अभी है नहीं, जो भावी है वह भी अभी नहीं है. धर्म का अनुभव वर्तमान में ही हो सकता है. 

Thursday, March 23, 2017

नव जीवन पल पल मिलता है

२४ मार्च २०१७ 
हम जहाँ हैं वहाँ नहीं होते, तभी परम के दरस नहीं होते
जिन्दगी कैद है दो कल में, आज को दो पल मयस्सर नहीं होते

स्मृति और कल्पना इन दोनों के मध्य ही निरंतर हमारा मन डोलता रहता है. अतीत की स्मृति और भविष्य की कल्पना. हम वर्तमान में टिकते ही नहीं, हमारे वर्तमान के कर्म भी अतीत के किसी कर्म द्वारा पड़े संस्कार से प्रेरित होते हैं अथवा तो भविष्य की किसी कल्पना से. जीवन में कोई नयापन नहीं बल्कि एक दोहराव नजर आता है, जिससे नीरसता पैदा होती है, जबकि जीवन पल-पल बदल रहा है, जिसे देखने के लिए मन को बिलकुल खाली होना पड़ेगा, हर सुबह तब एक नया संदेश लेकर आएगी और हर रात्रि कुछ नया स्वप्न दिखाएगी. अभी तो हमारे स्वप्न भी वही-वही होते हैं. हमारे अधिकतर कर्म प्रतिक्रिया स्वरूप होते हैं, चाहे वे भौतिक हों या मानसिक.  

Thursday, January 19, 2017

छिपे आज में दोनों कल

२० जनवरी २०१७ 
आज तक न जाने कितनी बार हमें यह लगा है, एक दिन सब ठीक हो जाएगा, और अब वे बातें याद भी नहीं हैं जिनके ठीक होने की कभी हमने कामना की थी. अतीत जैसे स्वप्न हो गया है, भविष्य कैसा होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारा आज कैसा है. वर्तमान ही भविष्य का बीज है, जैसा बीज वैसी फसल, सीधा सा हिसाब है, तो यही क्षण है जिसे हम आनंदित होकर जी सकते हैं.जो मिला था वह स्वप्न हो गया, जो मिलेगा वह आज के आनंद से ही उपजेगा, यही आध्यात्म हमें सिखाता है. वर्तमान का सुख ही एक दिन सुखद अतीत बनेगा और यही भविष्य की नींव है. वर्तमान में हमें सुखी होने से रोक रहे हैं यही दोनों, अतीत की स्मृतियां और भविष्य की कल्पना..समाधि है इनसे पार जाना. 

Sunday, December 18, 2016

राज अनोखा जिसने जाना

१९दिसम्बर २०१६ 
जीवन प्रतिपल एक रस बाँट रहा है, ऐसा रस जिसका न कोई ओर है न छोर, जो अपने होने की घोषणा नहीं करता, जो जरा सा भी मुखर नहीं है, जिसे महसूस करने के लिए मन की एक ऐसी सहज अवस्था चाहिए जो सन्तुष्टता से उपजती है. वास्तव में वर्तमान का हर नन्हा सा पल अपने भीतर अनंत तक प्रवेश करने की क्षमता छिपाये है. हम शब्दों के आवरण में इतने ढके हैं कि उस सूक्ष्म द्वार को अनदेखा कर देते हैं. अनजान भविष्य की दुश्चिंताओं के कारण तथा अतीत की स्वप्नवत स्मृतियों के कारण हम वर्तमान में रहते भी कहाँ हैं. हमारे  बिना ही जीवन इतना सरस और मधुर हो सकता है, इसका विश्वास भी तो नहीं होता। जिसे यह राज खुल जाता है वही वास्तव में घड़ी-घड़ी उस रस में डूब सकता है.

Friday, August 21, 2015

जगा रहे मन घड़ी-घड़ी


जीवन को गहराई से महसूस करना हो तो वर्तमान के क्षण में ही किया जा सकता है, पर हम न  जाने कितना समय अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं में खो देते हैं. रात्रि को स्वप्न देखना स्वाभाविक है पर जागते हुए भी भीतर जो विचार की धारा चलती रहती है वह स्वप्न ही है, संत जन तभी कहते हैं हम जागते हुए भी सोये हैं. जिस क्षण हम भोजन कर रहे हैं, मन कहीं और है, स्वप्न चल रहा है, ऊर्जा व्यर्थ ही बही जा रही है, जिस समय किसी से वार्तालाप कर रहे हैं, भीतर एक अन्य बातचीत चल रही है, अर्थात हम जहाँ होते हैं अक्सर वहाँ नहीं होते, इसी कारण मन थक जाता है. संतजन प्रफ्फुलित रह पाते हैं क्योंकि उन्होंने इस राज को जान लिया है, वह निरंतर ऊर्जा के प्रवाह को बनाये रखते हैं. 

Tuesday, August 4, 2015

सुख सपना दुःख बुलबुला


प्रारब्ध वश सुख-दुःख तो हमें मिलने ही वाले हैं, सुख आने पर यदि अभिमान आ गया तो नया कर्म बना लिया जिसका फल भविष्य में दुःख रूप में आएगा, दुःख आने पर यदि दुखी हो गये तो भी नया बीज डाल दिया जिसका परिणाम दुख आने ही वाला है. साधक को चाहिए कि दोनों ही स्थितियों में सम रहे, वे जैसे आये हैं वैसे ही चले जायेंगे, नया कर्म बंधेगा नहीं, वर्तमान भी सुधर गया और भविष्य भी. समता का अभ्यास नियमित ‘ध्यान’ करके किया जा सकता है.