आज के बदलते हुए दौर में आरम्भ से ही बच्चों को योग और ध्यान से परिचित कराना आवश्यक बन गया है. बच्चों को सत्य आसानी से अनुभव में आता है क्योंकि उनके पास अहंकार की कोई बाधा नहीं होती, न ही वे हर बात को बुद्धि से तोलते हैं. वे सीधे हृदय से ही अनुभव करते हैं. बुद्ध कहते हैं, जीवन में सभी कुछ परस्पर निर्भर है और नश्वर है. प्रकृति निरन्तर परिवर्तित हो रही है. ध्यान की गहराई में जब देह, मन, भावना, विचार सब कुछ स्पष्ट बदलते हुए दिखाई देते हैं तब उनके द्वारा प्रभावित होने का डर नहीं रहता. सत्य कभी बदलता नहीं और जगत एक सा रहता नहीं, इस बात को जब भीतर अनुभव कर लिया जाता है तो जीवन सरल हो जाता है, प्रेममय हो जाता है और सारा विषाद खो जाता है. वर्तमान में टिकना ही जागरण है. वर्तमान के क्षण में ही जीवन से मुलाकात हो सकती है. जैसे ही मन अतीत या भविष्य में जाता है, सत्य से नाता टूट जाता है. अतीत जा चूका, वह मिथ्या है, भविष्य अभी आया नहीं, केवल यही क्षण सत्य है. इस क्षण में पुरे होश के साथ जीना ही साधक का कर्त्तव्य है. ऊर्जा का सरंक्षण तभी सम्भव है.
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Friday, January 17, 2020
Monday, January 19, 2015
होश बने स्वभाव हमारा
सितम्बर २००७
सतत् होश
रखने की जरूरत है, उस समय तक रखने की जरूरत है जब तक जरा सा भी घास-पात या शैवाल भीतर
रह जाये, जब जरा सा भी घास-पात भीतर न रहे तो होश स्वभाव बन जाता है और यह होश
हमें मुक्त अवस्था में ला देता है. यही जीवन मुक्ति है, इच्छा गति है, इच्छा
भविष्य में है, हम तभी वर्तमान में आते हैं जब कोई इच्छा नहीं रहती. इच्छा काल पर
आधारित है. हम वर्तमान में नहीं रहते, समय को बांटते रहते हैं. इच्छा ही भविष्य है
और स्मृति ही भूत है. समय केवल वर्तमान में है. हम कल्पना और स्मृति में रहकर
वर्तमान को खोते रहते हैं, अपने आप को खो देते हैं. इच्छा हमें अपने आप से दूर कर
देती है.
Monday, November 25, 2013
कुछ मोती अनमोल
अप्रैल २००५
दीवानगीये इश्क के बाद
आखिर आ ही गया होश
और होश भी ऐसा होश कि
दीवाना बना दे !
दीवाने से कभी मत पूछो
कि क्या लोगे
अगर बोल बैठा तो क्या
दोगे ?
मांगो.. मांगो.. मांगो
तो सही मांगो
और सही का मतलब वही
मांगो
कभी कुछ, कभी कुछ
इससे तो बेहतर है नहीं
मांगो !
देना न भूलो, देकर भूलो
!
Wednesday, February 20, 2013
याद दिला दे कोई अपनी
अप्रैल २००४
होशपूर्वक
जीने की कला ही साधना है, सदियों की बेहोशी को तोड़ने के लिए हमें सदियाँ भी लगें
तो कोई बात नहीं, जितनी देर तक हम भूले रहे उसे न याद करके जितनी देर होश में रहे
उतना मंजिल के पास आ गए. होश में जीने का अर्थ है स्वयं को प्रकृति से ऊपर चैतन्य
से जोड़कर निज सहज स्वरूप में रहना. कृपा जब तक न हो इस ज्ञान की तरफ रूचि नहीं
होती, ज्ञान भीतर टिकता नहीं यदि मन समाहित न हो, मन तभी समाहित होता है जब ‘मैं’
मन से परे जा चुका होता है, अर्थात उसमें ईश्वरीय प्रेम की ललक लग जाती है, और ऐसा
प्रेम तभी जगता है जब उसकी कृपा होती है, पर उसकी कृपा का अधिकारी बनने के लिए तो
हमें प्रयास करना ही पड़ेगा., भीतर प्यास जगानी होगी, प्यास जितनी तीव्र होगी
पूर्ति भी उसी के अनुपात में होगी.
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