Monday, November 25, 2013

कुछ मोती अनमोल

अप्रैल २००५ 
दीवानगीये इश्क के बाद आखिर आ ही गया होश
और होश भी ऐसा होश कि दीवाना बना दे ! 

दीवाने से कभी मत पूछो कि क्या लोगे
अगर बोल बैठा तो क्या दोगे ?

मांगो.. मांगो.. मांगो तो सही मांगो
और सही का मतलब वही मांगो
कभी कुछ, कभी कुछ  
इससे तो बेहतर है नहीं मांगो !


देना न भूलो, देकर भूलो !

9 comments:

  1. जब द्रौपदी का चीर-हरण हुआ और वह विलख-कर कृष्ण को पुकारी तब कृष्ण ने द्रौपदी से पूछा-" क्या कभी तुमने किसी को कुछ दान किया है ? " द्रौपदी ने कहा-" हॉ नदी में नहाते समय एक साधू का कौपीन पानी में बह गया था, तब मैनें अपनी साडी फाड-कर, उनकी ओर बहा दी थी ।" कृष्ण ने कहा- " ठीक है द्रौपदी ! अब मैं तुम्हें दूँगा ...

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    1. बहुत सुंदर कथा..

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  2. सशक्त भावाभिव्यक्ति। बेहतरीन रचना।

    दीवानगी में हद से गुज़र जाना चाहिए

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  3. दीवानगी में हद से गुज़र जाना चाहिए ,

    जो अपने नहीं उन्हें एक बहाना चाहिए।

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि कि चर्चा कल मंगलवार २६/११/१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर कि जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है।मेरे ब्लॉग पर भी आयें ---http://hindikavitayenaapkevichaar.blogspot.in/पीहर से बढ़कर है मेरी ससुराल सखी(गीत

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    1. आभार राजेश जी

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  5. बहुत सुन्दर कहा !
    नवम्बर 18 से नागपुर प्रवास में था , अत: ब्लॉग पर पहुँच नहीं पाया ! कोशिश करूँगा अब अधिक से अधिक ब्लॉग पर पहुंचूं और काव्य-सुधा का पान करूँ |
    नई पोस्ट तुम

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  6. देना न भूलो, देकर भूलो !
    SATY AUR WED WAAKY

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  7. वीरू भाई, रमाकांत जी, कालीपद जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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