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Saturday, August 26, 2017

बीत रहा है पल-पल जीवन

२७ अगस्त २०१७ 
जीवन हर पल हमारे लिए चुनौतियाँ खड़ी करता है. यदि मन पल भर के लिए भी विचलित हो गया तो हम अपने मार्ग से च्युत हो जाते हैं. तभी तो कबीर कहते हैं, सत्य की राह तलवार की धार पर चलने के समान है. जिन आदर्शों को हम भीतर धारण करते हैं, यथार्थ की आंच पाते ही वे पिघलने लगते हैं, और हम फिर सामान्य बातों में उलझ जाते हैं और वह समय जो एक महत्वपूर्ण दिशा की और ले जाने का अवसर प्रदान कर सकने में सक्षम था, यूँही बीत जाता है. कितनी ही बार चलते-फिरते या किसी कार्य को करते समय मन में सहज स्फुरणायें उठती हैं, कुछ प्रेरणादायक वचन, कुछ योजनायें भीतर पनपती हैं. अल्प सा विचार करके जिन्हें कार्यान्वित किया जा सकता था परन्तु परिस्थितियों की हल्की सी भी असुविधा हमें पुनः अपने जीवन को यथावत चलते रहते देने के लिए पीछे ले जाने में सफल हो जाती है. प्रतिपल लक्ष्य की स्मृति बनी रहे तभी आत्मा का विकास सम्भव है.

Monday, March 9, 2015

नहीं बने मन आग्रही

अप्रैल २००८ 
हमें स्मृति के साथ-साथ धृति का विकास करना है. धृतिं का अर्थ है धारणा, धैर्य ! यह मन की क्रिया है, मन के टिकने की क्रिया. एक वस्तु पर टिककर यदि मन का चिन्तन चले तो मन का समाधान हो जाता है. धारणा दृढ़ होना साधक के लिए अति आवश्यक है. सहनशक्ति की कमी से ही हम जगत में दोष देखते हैं. यदि किसी में दोष दिख भी रहे हों फिर भी उसे निर्दोष देखना होगा क्योंकि अपने दृष्टिकोण से वह सही है. खुद को सही मान रहा है. साधक को आग्रह शील नहीं होना है. इस जीवन में सभी को अपनी यात्रा अपने ढंग से करनी है. कोई जिन आदर्शों का पालन सहज रूप से करता है या करना चाहता है, हो सकता है अन्यों के लिए वे निरे व्यर्थ हों या अति कठिन हों या उन्होंने उनके बारे में कभी सोचा भी न हो, तो किसी को कोई हक नहीं कि अन्यों को भी वैसा करने पर बाध्य करे, शुद्ध चेतना कभी आग्रह नहीं करती, वह सबका सम्मान करती है, वह सारे जगत को निर्दोष देखती है. वह अपना मत थोपती नहीं.  

Wednesday, June 27, 2012

महाजीवन की ओर


अप्रैल २००३ 
सदगुरु कहते हैं कि युग परिवर्तन चाहते हो तो स्वयं को बदलो, हिंसा का युग है, सही है, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. पर न हम हिंसा को रोकने में समर्थ हैं न भ्रष्टाचार को, सामर्थ्य है तो इतनी ही कि हमारे मन में हिंसा न हो, मनसा, वाचा, कर्मणा ऐसा कुछ भी न हो जो किसी को दुःख दे, न तो हम खुद भ्रष्टाचार को प्रश्रय दें न अपने आचरण में कोई ढील दें. एक-एक व्यक्ति स्वयं को दीप बनाता चले तो उजाला होने में देर नहीं हो सकती. हमें खुद को बदलना है, यह जगत ऐसा क्यों है इसकी परवाह किये बिना. कृष्ण को अपना आदर्श बनाना है जो सारे संकटों के मध्य भी विचलित नहीं होते. वह हमें आवाहन देते हैं कि स्वयं को जानकर सन्तोष, पूर्णता, रस, आनंद व प्रेम का अनुभव करें. इंसान की सारी दौड़ इसीलिये तो है कि इतना कुछ पा ले कि भीतर शांति महसूस करे, उसे सुख मिले. तो इस दौड़ का अंत तभी हो जाता है जब हमें खुद में विश्रांति पाने की कला आ जाती है. हम अपने घर लौटना सीख जाते हैं.  जीने की इच्छा के कारण हमें तन मिला, फिर कर्मों के बंधन के कारण विभिन्न जन्म मिले. स्वयं में स्थित होने पर पुराने कर्मों के बीज नष्ट हो जाते हैं, और तब महाजीवन का आरम्भ होता है.

Wednesday, June 29, 2011

मानवता



जुलाई  २००० 
मानव का सतत् प्रयास यही होता है कि वह उन्नति करे, आगे ही आगे बढ़े... अनंत की ओर उसका प्रस्थान उसी ऊंचाई की तलाश है, जहाँ वह पहुंचना चाहता है. अपने आस-पास के समाज को यदि हम गहराई से देखें तो भौतिक उन्नति के चिह्न स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं, पर मात्र भौतिक उन्नति ही काफ़ी नहीं, एक और क्षेत्र है आत्मिक उन्नति का. जहाँ आगे बढ़ने के लिये ईश्वरीय प्रेरणा सहायक होती है. कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर को मानव ने अपने आदर्शों का मूर्त रूप बनाकर स्थापित किया है. ऐसा कहते हुए वे मानवीय चेतना को परम तक पहुंचने में समर्थ मानते हैं, वह ऐसी स्थिति है जहाँ मानव और ईश्वर के बीच कोई भेद नहीं रह जाता. कोई वहाँ पहुँच चुका है यह बात अन्यों को प्रेरणा देती है. जैसे पानी का स्वभाव है ऊपर से नीचे की ओर बहना, मानवता का स्वभाव है नीचे से ऊपर की ओर बढ़ना.

Tuesday, June 7, 2011

पूर्णता


अप्रैल २०००
यदि हमारे जीवन का केन्द्र ईश्वर हो तो किसी भी तरह का दुःख या बाधा उसे घेर नहीं सकती, जहाँ ईश्वर का निवास होता है वही घट वैकुंठ बन जाता है. यदि हम अपने चारों ओर ध्यान से देखें तो पता चलता है कि मूलतः सभी इंसान एक हैं, सभी के कुछ आदर्श हैं, कुछ इच्छाएं हैं, कुछ सपने हैं, और सभी उस पूर्णता की तलाश में हैं, जिसे पाकर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता, जिसे जानने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रह जाता.