Thursday, October 10, 2013

खाली मन झलकाए उसको

मार्च २००५ 
हमारे मन में न जाने कितने प्रकार के भय छिपे हैं, चेतन मन के भय दिख जाते हैं, अचेतन मन के भय जो छिपे रहते हैं कभी-कभी उभर कर सताते हैं. मृत्यु का भय तो मूल है. हम जानते नहीं कि जन्म के साथ ही मृत्यु शुरू हो जाती है, धीरे-धीरे हम सभी उसका ग्रास बनने की तैयारी में हैं, यह जीवन जो ऊपरी तौर पर स्थायी प्रतीत होता है, कहाँ स्थायी है, हर क्षण बदल रहा है, हमारी सोच भी बदलती है. प्रियजनों से बिछड़ने का भय हो या अकेलेपन का भय उसी को सताता है जो अपने भीतर नहीं गया, भीतर प्रेम का एक अजस्र स्रोत बह रहा है उसे पा लेने के बाद जगत में रहकर भी साधक अपने आप में रहता है, आत्मा में ही संतुष्ट रहता है. जगत उसके लिए कुछ करे ऐसी उसकी आकांक्षा नहीं रहती, वह स्वयं जगत के लिए क्या करे, यही भाव उसमें प्रबल रहता है. उसका होना एक फूल के समान होता है, उसमे सिर्फ लुटाने की चाह है, अपना सब कुछ खाली कर देने की चाह, क्योंकि खाली मन में ही उसके प्रियतम का आगमन होगा, वह सदा प्रतीक्षारत रहता है जगत की नहीं जगदीश की.

9 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11-10-2013) को " चिट़ठी मेरे नाम की (चर्चा -1395)" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.
    नवरात्रि और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें

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    1. राजेन्द्र जी, बहुत बहुत आभार !

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  2. बहुत सुंदर बात ....आभार अनीता जी ...!!नवरात्र की शुभकामनायें ....!!

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    1. आपको भी नवरात्र की शुभकामनायें..

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  3. आपके इस प्रेरणापद लेख ने एक बिसरी हुई कविता की पंक्तियाँ याद दिला दीं , प्राणों में जो प्रेम की प्रतिष्ठा एक बार हुई प्राण छल छंद के विकार तजने लगे. नवरात्री की शुभकामनाओं के साथ सादर नमन !!

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आप की इस प्रविष्टि की चर्चा शनिवार 12/10/2013 को त्यौहार और खुशियों पर सभी का हक़ है.. ( हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल : 023)
    - पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर ....

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    1. आभार, उपासना जी.

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  5. बहुत सुंदर बात कही आपने..

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  6. सही बात कही आपने |

    मेरी नई रचना :- मेरी चाहत

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